akhilesh Shrivastava 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक गांव का बचपन 69331 0 Hindi :: हिंदी
गांव में बीते बचपन का , मुझे स्वप्न दिखाई देता है |
अपने गांव का वो प्यारा,मुझे द्रश्य दिखाई देता है ||
कांव -कांव कौवों की ,हमको सुबह सुनाई देती थी |
वृक्षों पर तोता मैना की ,हलचल होती रहती थी ||
कुहू-कुहू कोयल की, बोली मन प्रसन्न कर जाती थी |
घर के आँगन में गोरैया, दाना चुगने आती थी |
गाय रंभा -रंभा कर ,बछड़े को पास बुलाती थी |
दूध पिलाकर बछड़े को ,अमृत हम को दे जाती थी ||
खेत में जाते बैलों की ,घंटी टन- टन बज जाती थी |
गांव के मंदिर से शंख की , ध्वनि सुनाई देती थी ||
खेतों की हरियाली प्यारी ,सबके मन को भाती थी |
आमों की अमराई की ,वो छांव सुहानी लगती थी ||
दोस्तों की वो हंसी ठिठोली ,हमको प्यारी लगती थी |
गांव के प्यारे अपने पन की ,सीख सुहानी लगती थी ||
कच्ची पगडंडी की गलियां हमको प्यारी लगती थी |
ठंडी शुद्ध हवा की खुशबु,हमको प्यारी लगती थी ||
शहरों के कोलाहल से हमें शांति प्यारी लगती है |
गांव में बीते बचपन की , हमें यादें प्यारी लगती हैं|
रचियता --- अखिलेश श्रीवास्तव
I am Advocate at jabalpur Madhaya Pradesh. I am interested in sahity and culture and also writing k...