Beauty yadav 20 Feb 2024 कविताएँ समाजिक तिलमिलाती गरीबी, लाचारी ,वेवसी,मजबूरी 32145 0 Hindi :: हिंदी
कड़कती ठंड में ,
चीथड़ों में तिलमिलाती गरीबी
कलम पकड़ने की उम्र में ,
पत्थर उठाती गरीबी
बच्चे को कंधे पर लिए ,
फूल बेचती मां की बेशर्म गरीबी
अक्सर भूखे पेट रह जाते हैं वह किसान
जो सबका पेट भरने के लिए अन्न उपजाते हैं ।
शाम को थककर सो जाते हैं वह मजदूर ,
जो सड़कों पर ऊंची इमारतें बनाते हैं ।