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दो जून कि रोटी-रभ से अरदास

Raj Ashok 07 Jun 2023 कविताएँ समाजिक रोटी 30450 0 Hindi :: हिंदी

सवाल........,? 
पुछती. कमजोर निगाहे.
आखिर ,क्यों ..... ?
ज़िन्दगी को योही , 
ये दर्द देना था। 
क्या ,सूरज की तपन मे 
हमने पसीना नही बहाया। 
सघर्ष तो ,उतना ही किया था । 
हमने भी 
जीवन को बेहतर बनाने के लिए ....
जितनी मेहनत करते है । 
बाकी ओर लोग .....?
पेट की मजबुरी 
और भाग्य की कमजोरी
ने कभी,  दो जून की रोटी 
से बाहर .......
निकले नहीं दिया। 
हैरत.....है ।
इतनी फसले पैदा की 
फिर भी तरस रहे है । एक -एक 
अन्न के दाने को, 
ज़िन्दगी के झोले मे
 बस  .......  ।
रभ से अरदास 
बची है।

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