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बुढ़ापे की रोटी

Rambriksh Bahadurpuri 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक #Rambriksh Bahadurpuri #Rambriksh Bahadurpuri kavita#Rambriksh Bahadurpuri Ambedkar Nagar 35900 0 Hindi :: हिंदी

कविता -बुढ़ापे की रोटी

किसके चाह में
भटकते हो राह में
अपनो से अलग 
करते औलाद को
बिना उम्र के
बस्ते के बोझ को
लाद देते हो
बिना किसी सोंच के
औलाद भी होता है दूर
जिसे रहना चाहिए
आप के पनाह में। 
दिन और रात को 
रट रट कर पढ़ता है
मोटी मोटी किताब को
बिना सीखें ही
किसी संस्कार को,
पढ़ कर कुछ बनकर
आता है अपनों में
लेकर धन दौलत
ढेरों उपहार को,
और फिर छोड़ जाता है
तन्हां गैरों सा
पड़ा का पड़ा रह जाता है
ढेर पैसों का,
रह जाते हैं सोंचते
गगन की ओर देखते
देना चाहिए हमें पहले
संस्कार को,
रख कर पास में
अपने औलाद को
अब धन दौलत
लगती है खोटी
केवल संस्कार ही
खिलाती है
बुढ़ापे की रोटी। 

रचनाकार -रामबृक्ष बहादुरपुरी अम्बेडकरनगर यू पी 






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