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बरसात की बूंद

संदीप कुमार सिंह 14 Jun 2023 कविताएँ समाजिक बरसात की बूंद, चाहत, आहत, खुशियाँ, पुकार रहा था, तेरी यह अदा, बेसब्र कर आई, तुम मेरी शायरी, तुम मेरी गजल, तुम बरसात की बूंद। 33285 0 Hindi :: हिंदी

तूं बरसात की बूंद बन मेरी चाहत आई हो,
मेरे लिए बस और बस खुशियाँ लाई हो।

राह मैं तेरी देख रहा था कब से,
तेरे आने के लिए पुकार रहा था कब से।

तूं आई लेकिन दिल को बेसब्र कर आई,
तेरी यह अदा हम सब को खूब भाई।

तेरे आने की खुशी में मैं गजल लिख रहा हूं,
तुझे प्यार देने के लिए शायरी कर रहा हूं।

तूं इतनी सुंदर बरसात की बूंद हो,
मेरे मरुस्थल की तुम से जान है।

अंगारे जो फैले जा रहे थे तपन का,
उस तपन की तुम ही तो दवा हो।

सारे बाग खुशियों में हंसने लगे हैं,
एक_दूसरे से उल्फत की बात करने लगे हैं।

तुम आई हो तो दिव्य राहत लाई हो,
अलौकिक स्नेह की तुम बूंद आई हो।

सारे विरह_वेदना खत्म करने आई हो,
प्यार के आनंद में सबको डुबोने आई हो।

जो सुख रहे थे झाड़_झाड़ियां,
उसमें तुम प्राण डालने आई हो।

बड़े_बड़े पेड़ भी मुरझाने लगे थे,
इसमें भी तुम जान डालने आई हो।

अम्बर की तुम अनमोल रत्न हो,
अब धरा को भी चमकाने आई हो।

तूं बरसात की बूंद बन मेरी चाहत आई हो,
मेरे लिए बस और बस खुशियाँ लाई हो।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍️
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)
बिहार

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