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बादल

Rambriksh Bahadurpuri 29 Jun 2024 कविताएँ समाजिक #Rambriksh Bahadurpuri kavi#ambedkarnagar poetry #Badal per kavita #versha per kavita 22775 0 Hindi :: हिंदी

बादल 

रूठ गये क्यों
हो हमसे तुम?
सूख गये क्यों 
हो जल से तुम?

मुझे पता है
क्यों रूठे हो?
बूंद बूंद से 
क्यों सूखे हो?

छोड़ो नादानी 
बच्चों सा तुम
दे दो धरती 
पर अब तो जल 
बरसो बादल 
बरसो बादल। 

फूल पत्तियां 
सूख रहे हैं 
खुशियां गम से 
जूझ रहे हैं 
ताल तलैया 
नहर पोखरे
चटक चटक कर 
टूट रहे हैं 
भूख प्यास से 
व्याकुल होकर 
तड़प रहे हैं 
पशु पक्षी दल,
बरसो बादल 
बरसो बादल। 

वन उपवन कट 
रहें धरा पर 
तपे दिवाकर 
तपे निशाकर 
उलट रहे हैं 
सभी व्यवस्था 
हार रही है 
प्रकृति जन से 
दिन प्रतिदिन 
हो होकर विह्वल,
बरसो बादल 
बरसो बादल। 

कड़क कड़कना 
बादल तेरा 
जायज है पर 
हम मानव हैं 
अपने ही कर्मों के कारण 
आज बने हम 
सब दानव हैं 
स्वार्थ लिए 
सिर पर अपने सब
डाल काटते 
बैठें जिस पर 
फिर भी डर न 
खौफ तनिक भी
हे! नीरद 
अब दया करो तुम 
तन को मन को 
हरा करो तुम 
तेरे बिन सब 
निर्बल हर पल
 बरसो बादल 
बरसो बादल। 


           रचनाकार 
      रामबृक्ष बहादुरपुरी 
अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश

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