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बादल

Umendra nirala 17 May 2024 कविताएँ अन्य Umendra nirala sahitya rachna 45166 0 Hindi :: हिंदी

हे बादल!
अब तो बरसो 
भू - गर्भ में सुप्त अंकुर 
क्षीण अनाशक्त, 
दैन्य-जड़ित अपलक नत-नयन
चेतन मन है, शांत।
नीर प्लावन ला एक़ बार 
देख प्रकोप हृदय थामेगा संसार,
तेरी हुंकार से ऊषा होगा 
क्षत - विक्षत अंकुर का उद्धार।
गिरी का गौरव है, ऊँचा 
दिखा ताड़ित आघात-आक्रोश,
नत-मस्तक होगा सिर उसका 
शक्ति-प्रभाव से फूट अंकुर वृक्ष होगा।
आतंक भवन ढहाने को
लाओ उनमें नया उन्माद,
अर्ध-क्षुधित, निरस्त्र, शोषित- जन
शक्ति का रस भार।
ताप-ऊमस की भीषणता का प्रतिकार
तुझे बुलाता सहमा श्रमिक,
प्लावन को उत्तेजित कर 
नव-जीवन का हो खुशहाल।

                          नाम - उमेन्द्र निराला 
                        अध्ययन - इलाहबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय प्रयागराज (उ. प्र.)
                        पता - ग्राम हिनौती, पोस्ट ऑफिस -सिजहटा, तहसील - रामपुर बाघेलान, जिला - सतना (म. प्र.)

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