Anany shukla 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक बचपन आज यह सोच रहा 137514 0 Hindi :: हिंदी
बचपन आज यह सोच रहा कहाँ खो गया आज वो खुद अपने को खोज रहा बस्तो के नीचे दबा हुआ सोने के समय जगा हुआ भाग दौड़ के इस समय में वो समय के पीछे खो रहा बचपन आज यह सोच रहा चेहरे की पहचान वही है पर अधरों पर मुस्कान नहीं है रंग उड़े हैं उन चेहरों के क्या बचपन का अंदाज यही है आँखो से गिरते आंसू के पीछे खुद अपने को वह खोज रहा बचपन आज यह सोच रहा