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अरमाँ

Alfaaz Hassan 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक 66580 0 Hindi :: हिंदी

बिखरे बिखरे पड़े हैं मेरी आँखों में 
मेरे अधूरे से अरमाँ। और ये पङे पङे मेरी 
आखों में ही नित रोते हैं। और जब ये बिखरते है जमी पर तो मै भी बिखर जाता हूँ तिनका तिनका  होकर इनके सगं। 

और फिर करता हूँ कोशिशे की समेट के तिनका तिनका ख्वाबों का  रख लेता हूँ 
तकिये के नीचे और बेचैनी से करवट बदल 
बदल कर सोता हूँ। ।
देखता हूँ जब किसी और का ख्वाब सच होते हुए तो छुप छुप के इस दुनिया से मैं तनहा सा होके रोता हूँ। ।


उठती है पल पल मेरे दिल में ईक कसक सी अपने ख्वाबो को साकार करने की। 
बिलख  बिलख कर दिल करता है फरमाईशे ख्वाबों के खुले आसमान में उङान भरने की।  
और फिर अपनी किस्मत के डर से देता हूँ 
क़ोई मीठा सा दिलासा अपने बिलबिलाते 
से दिल  को।  लेकिन ये जिददी  दिल है  कि मेरी कोई बात नहीं  सुनता। 
और फिर खामोश सा रहकर  ये नये ख्वाब  है  बुनता।



कब तक मै संभाल के रखू अपने भीतर पङी पोटली जज्बातो की। मुझे यकीं है कि  एक दिन  जरा जरा करेगा नुमाइंश मेरे अलफाजो की और मैं भी ऊङूगा अपने ख्वाबो के आसमान में तोङके बेङीया अपनी किस्मत के बद दरवाजा की 

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