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अन्तर्वेदना

Sudha Chaudhary 20 Apr 2023 कविताएँ दुःखद 51604 0 Hindi :: हिंदी

लिख रही दोपहर थी
  ठीक पीछे शाम थी ।  
खुल रही परत परत 
अंतर वेदना पास थी।
चल रही थी कोर कल्पित 
कल्पना की धार थी ।
मैं अंधेरी पाठशाला 
किस बात में खास थी।
कह रही थी पीर मेरी
चल तू अपने नीड़ में
रुक रही है किस लिए
चल पड़े सब बिन तेरे।


सुधा चौधरी

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