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अगर वक़्त इंसान होता…

Nihal singh 16 May 2026 कविताएँ समाजिक #हिन्दी कविता #समय #निहाल सिंह #यथार्थ #जिवन #समय से बात 4756 0 Hindi :: हिंदी

अगर वक़्त इंसान होता…

अगर वक़्त इंसान होता,
तो मैं उससे यूँ ही नहीं मिलता—
मैं एक मुक़दमे की तरह
उसके सामने अपना दर्द रखता।

कहता—
“ऐ वक़्त!
तेरे ख़िलाफ़ मेरे पास
लम्हों की गवाही है…
हर वो ख़ुशी,
जिसे तूने मुकम्मल होने से पहले
ख़ामोशी की मिट्टी में दबा दिया।”

तूने ही तो
मोहब्बत को मोहलत नहीं दी,
हर ‘हम’ को
तन्हाई की सौग़ात भर-भर कर दी।

कभी ख़्वाबों को
सूरज तक पहुँचने नहीं दिया,
कभी हक़ीक़त को
साँस लेने की फ़ुर्सत नहीं दी।

मैं पूछता—

“आख़िर तेरी फ़ितरत क्या है?
तू मरहम है…
या रगों में दौड़ता हुआ नमक?

क्यों हर मुलाक़ात के साथ
जुदाई का साया चलता है?
क्यों हर क़रीबी रिश्ता
तेरे ही हाथों में आकर दम तोड़ देता है?

क्यों कुछ लम्हे
पत्थरों से भारी लगते हैं,
और कुछ सदियाँ
रेत की तरह फिसल जाती हैं?

तू ख़्वाब दिखाता क्यों है,
जब उन्हें टूटना ही होता है?
तू पास लाता क्यों है,
जब सबको छूटना ही होता है?”

अगर वक़्त इंसान होता,
तो शायद जवाब देना पड़ता…

वो कुछ देर तक
मेरी तरफ़ देखता रहता—
जैसे सदियों से चुप कोई सच
लबों तक आने से हिचकता हो।

फिर कहता—

“मेरी मर्ज़ी कुछ नहीं…
मैं तो बहता हुआ एक रास्ता हूँ,
न मरहम, न नमक—
मैं बस वो सिलसिला हूँ
जो हर चीज़ को उसके अंजाम तक ले जाता है।

हर मुलाक़ात के साथ
जुदाई इसलिए चलती है,
क्योंकि मिलने की असली क़ीमत
सिर्फ़ बिछड़ने के बाद समझ आती है।

मैं जुदा नहीं करता किसी को…
मैं तो बस परतें हटाता हूँ,
जो साथ चल नहीं सकते,
वो ख़ुद-ब-ख़ुद पीछे छूट जाते हैं।

कुछ लम्हे भारी लगते हैं,
क्योंकि तुम उनमें जीते कम,
ठहरते ज़्यादा हो…
और कुछ सदियाँ गुज़र जाती हैं—
क्योंकि वहाँ दिल
कभी ठहरता ही नहीं।

मैं ख़्वाब नहीं तोड़ता…
मैं तो बस इतना करता हूँ—
जो सच की धूप सह नहीं पाते,
उन्हें ख़्वाबों की छाँव दे देता हूँ…”

और फिर—
वो चला जाता है,
मेरे सारे सवाल
मेरे ही हवाले करके।

तब समझ आता है—

वक़्त इंसान होता,
तो शायद कसूरवार होता…

मगर वक़्त सज़ा नहीं देता,
बस आईना रख देता है—
और इंसान
खुद ही अपना गुनहगार निकल आता है।

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