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अब न रही वो गाँव में

संदीप कुमार सिंह 26 Apr 2023 कविताएँ समाजिक मेरी यह कविता समाजिक हित में है। जिसे पढ़कर पाठक गण काफी लाभान्वित होंगें। 37896 0 Hindi :: हिंदी

अब न रही वो गाँव में, मस्ती में रत रात।
मिले मतलबी लोग अब,करे व्यर्थ की बात।।

अब न रही वो गाँव में,शुद्ध सरल सी प्रीत।
दिखते सभी नकाब में,गाए बद संगीत।।

अब न रही वो गाँव में, कोयल की मधु तान।
हुए सभी अब बेसुरा,लुप्त हुआ है ज्ञान।।

अब न रही वो गाँव में,सरिता दिव्य बहार।
करे युवक सब अब नशा,सुन्दर नहीं विचार।।

अब न रही वो गाँव में,दिव्य भव्य मुस्कान।
अजब समय का फेर है,गायब है सच मान।।
(स्वरचित मौलिक)
संदीप कुमार सिंह✍🏼
जिला:_समस्तीपुर(देवड़ा)बिहार

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