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आत्मसमर्पण

Rambriksh Bahadurpuri 02 Jul 2025 कविताएँ समाजिक #रामवृक्ष बहादुरपुरी #आत्मसमर्पण#कविता#नारी 17454 0 Hindi :: हिंदी

आत्मसमर्पण 


समुद्र न होता तो!
मिट जाती -
मटकती 
मचलती 
थिरकती 
चंचल
नदियों का आस्तित्व,
बन जाती -
विनाशक 
घातक
तोड़कर किनारों की सीमा,
भटक जाती- 
अपने पथ से 
फिर कहाॅं मिलता?
अनेकों नाम
पद
प्रतिष्ठा 
सम्मान,

कैसे करती आत्मसमर्पित 
अपने आप को 
मीठी 
स्वच्छ 
साफ
पवित्र 
तरुण तरुणी सी  
पहुॅंच कर समुद्र की गोंद में,
और स्वयं हो जाती है खारा। 

       रचनाकार 
   रामवृक्ष बहादुरपुरी 
अम्बेडकरनगर उत्तर प्रदेश

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