Pradeep singh " gwalya " 03 Feb 2024 कविताएँ प्यार-महोब्बत Psdrishti.blogspot.com 45243 0 Hindi :: हिंदी
मैं बिकने तक को राजी था
उसके प्यार के बाजार में
नजरें लड़ने तक की तो आस थी ही
पर कमवख्त उसने
नजर तक नहीं फैरी
शायद उसे नहीं खबर
कि हमेशा एक जैसी आस लगाए रहना
आसान नहीं होता।।
उसने तो यूं ही ‘ना’ में
अपनी गर्दन हिला दी
उसके दिल में क्या है
एक झटके में जाता दी
शायद उसे नहीं मालूम
कि उसके बाद भी दो पल और जीना है
ऐसी प्रेरणा रखना भी
आसान नहीं होता।।
कारण क्या था या क्या है
उसकी ‘ना’ का
ये प्रश्न दिल में अब कम आता है
पर जब भी आता है
यकीन मानो उस पल
ये दिल कुछ पल रुक सा जाता है
और उसे तो क्या ही पता
कि रुके हुए दिल से प्यार की उम्मीद करना
आसान नहीं होता।।
इससे पहले लगता था कि मैं
किसी प्यार के मैले में खोया हूं
पर अब खुद में खोए रहने की खबर
अक्सर मिलती है
माना कि सुरूप पहले भी नही था मैं
पर अब शक्ल शीशे में ओर बदतर मिलती है
और उसे पता हो या ना हो
पर निराश शक्ल को बार बार शीशे में देखना
आसान नहीं होता।।
✍️ प्रदीप सिंह ‘ग्वल्या’
pradeep singh 'ग्वल्या' from sural gaon,pauri garhwal,uttarakhand. Born in 29/06/1995 ...