Anilkumar Rathwa (Sameer) 09 Dec 2025 कविताएँ समाजिक "आज संघर्ष, कल इतिहास" 9492 5 5 Hindi :: हिंदी
त्याग तो करना होगा, नींद का या फिर सपनों का— जो आराम से समझौता कर बैठा, वो मंज़िल से हाथ धो बैठा। यह दुनिया तकिए नहीं देती, यहाँ बिस्तर नहीं, संघर्ष मिलते हैं, जो अलार्म से पहले जागे नहीं, उसके सपने अधूरे ही मरते हैं। सपने ताली नहीं, खून-पसीना मांगते हैं, जो आज थक गया, कल उसके नाम सिर्फ़ बहाने बचते हैं। खुद से हार गया जो एक बार, वो भीड़ की पहचान बन जाता है, जो दर्द से रोज़ टकराता है, इतिहास वही लिख जाता है। इसलिए तय कर आज ही— आराम या नाम, क्योंकि नींद से समझौता नहीं हुआ तो ज़िंदगी भी कभी समझौता नहीं करेगी। नींद तो रोज़ आएगी, सपने रोज़ नहीं। अब चुन— या तो जाग, या फिर पूरी उम्र पछता।