Anilkumar Rathwa (Sameer) 21 Nov 2025 कविताएँ समाजिक “संघर्ष” 8899 0 Hindi :: हिंदी
आज का युग बदला है, सोच नई हो गई, पर मेहनत की राह अभी भी वही पुरानी है भाई। सपने तो सब देखते हैं आसमान जितने ऊँचे, पर बिना पसीना बहाए मिलते नहीं मुकाम सच्चे। घर बैठे ही सब कुछ पा लेने की चाह तो अच्छी है, पर राह में गिरना-संभलना ही मंज़िल की सच्ची सीढ़ी है। जो उठकर चल देता है, वही कल इतिहास बनाता है, जो आलस में डूबा रहता है, वक़्त उसे पीछे छोड़ जाता है। कोई चाबी नहीं है जो बंद दरवाज़े खुद-ब-खुद खोल दे, कोई मंज़िल नहीं जो बिना कोशिश कदमों में ढोल दे। उठना होगा, चलना होगा, अपनी ताक़त खुद पहचान, मेहनत की अग्नि में ही तपकर बनता है इंसान। घर बैठे सपने चमकते तो हैं, पर सच तभी बनते हैं, जब युवा अपने पंखों की ताक़त से आसमान छूते हैं।