Ratan kirtaniya 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक इस दुनिया में जो गरीब होता है उसकी दुरदशा का मर्मिक चित्रण है 69167 0 Hindi :: हिंदी
मैं एक इन्सान -
निर्धन की संसार ;
शिति - दीन हूँ ,
मुझे कहीं जगह ना मिला -
इसलिए उत्पीड़न की गर्भ में लिया स्थान ;
मैं आधि - व्याधि की गर्भ से निकलकर खिला ,
मैं शिति -दीन -
बड़ी अभागी है मेरी जननी ;
आधि - व्याधि मेरा जन्म दाता -
व्यथा मेरा पिता ,
अत्रु है जीवन कहानी ।
उर में अत्रु की सागर -
काटेंं से बने अपना डगर -
मैं कौन ! क्या है अभिलाषा ?
सब कुछ है बंजर -
निर्धन का है संसार ,
कभी - कभार मिलता भर पेट आहार -
कभी कुछ नहीं ! तो पीता हूँ ज़हर ;
अत्रु से प्यास बुझाता हूँ -
भूखा पेट सोता हूँ ;
ना लिया मेरा कोई खबर -
रिश्ते - नाते बहुत हैं सारें -
वह सब नाम के -
ना कोई काम के -
जो रहती है हर पल साथ ;
दुनिया से क्या कहूँ -
तिमिर में छोड़ा अपना साथ ।
ना मेरा कोई मित्र ;
ना है मेरा भगवान -
क्योंकि मैं गरीब इन्सान ;
जिन्दगी का रास्ता तिमिर -
परिमल है तो बदलता समीर ,
मुश्किल है लेना साँस ;
दुनिया में -
कैसे कँरु निवास ।
अब कुछ लिखता हूँ -
वक्त को स्त्री रुप में डालता हूँँ ;
मैं सुन्दरी नारी -
दुनिया में अकेली -
अबला बन चुकी हूँ ;
दर्द भरी उर हमारी ;
ना समझा व्यथा हमारी ,
ऐ कैसी संकट की घड़ी ;
भूख से बेहाल होकर -
दिन बीता रहे हैं तड़प -पड़पकर -
लालन - पालन करती देह बेचकर -
मेरी परिचय दूँ -
वेश्या !
मैं अनाथ -
भटकता राहों में -
टूटा उर मेरे साथ ;
काटों से सजा जीवन पथ ,
भिक्ष से गुजारा होता -
पल - पल हालत से डरा हूँ -
संकल्प से लड़ा हूँ -
मैं जिन्दा खड़ा हूँ ।
निर्धन की संतान -
देख तमाशा उसका -
कोई नहीं है दुनिया में जिसका -
अब ना रहा कोई मेरा ;
तो कैसे मिलेगा सहारा ,
जा तू साँस की डोर तोड़के -
मत आ तू दुनिया में वापस मुड़के ,
अब ना रहेगा बेसहारा इन्सान -
अभ्युदय हो हर इन्सान ;
हीरा बनके चमकेगा हर इन्सान ।
रतन किर्तनीया
मो * 9343698231