Mohd meraj ansari 20 Sep 2023 कहानियाँ समाजिक बचपन, बचपना,मासूमियत, मासूम, सफर, रास्ता, निगाहें, नजरें, शांति, मगन, सुहाना सफर, चिंता, सोच 46024 0 Hindi :: हिंदी
सुबह मुझे व्हाट्सएप पर मेरे कलीग राकेश भाई ने मेसेज किया की एक साइट पर जाना है मेजरमेंट चेक करने। मैं रास्ते में राकेश भाई का इंतजार कर रहा था। मेरे पास बाइक नही थी इसलिए राकेश भाई कि बाइक से ही दोनो लोग साइट पर जाने वाले थे। वो बाइक लेकर आए और हम दोनो साइट पर गए। वो मेजरमेंट हम दोनो ने ही लिया था एक नया प्रोजेक्ट था। मीजरमेंट चेक करना जरूरी था क्युकी लाखों का मैटेरियल उसी मेजरमेंट के आधार पर बन कर तैयार होने वाला था। अगर मेजरमेंट में कोई भी गलती हुई तो काफी नुकसान हो जाता इसलिए हम दोनो वहां जा रहे है अपनी तसल्ली के लिए। शनिवार का दिन था और साइट पर छुट्टी रहती है। वहां जाने पर पता चला कि कोई भी नही आया है। हर दरवाजे पर आई डी लॉक लगा है जो सिर्फ वहां के एम्प्लॉय की आई डी से ही खुलेगा। अब 50 किलोमीटर जाने के बाद बिना कुछ काम किए वापस आने पर तो गब्बर वाला हाल हो जाता हमारा। बॉस बोलते खाली हाथ आ गए। सजा मिलेगी बराबर मिलेगी। इसलिए थोड़ा इंतजार किया कि किसी न किसी की तो ड्यूटी आज के दिन होगी ही। लंच से थोड़ी देर पहले एक व्यक्ति हमे मिले जिन्होंने बताया कि कुछ जगह तो लॉक नही हैं अगर वहां हमारा काम हो तो हम कर सकते हैं। फिर हमने लोकेशंस देखे और विचार विमर्श किया कि किस तरह से काम की प्लानिंग करनी है और कौन सी मशीन कहां लगेगी वगैरह। वो डिस्कशन करने के बाद हमने लंच किया और फिर थोड़ी देर बाहर निकले टहलने। खाना खाने के बाद टहलना एक अच्छी आदत है। अब वापस साइट पर जाकर हमने मेजरमेंट चेक करना शुरू किया। ड्राइंग के हिसाब से थोड़ा अलग मेजरमेंट भी लिया ताकि एक और दिशा से हमे मेजरमेंट को तसल्ली करना आसान हो जाए। अपना काम निपटाया और थोड़ी देर साइट पर ही बैठे आराम किया। काम तो थोड़ी देर का ही था। अब अगर 2 घंटे में काम निपटा कर फ्री हो जायेंगे तो वापस अपनी फैक्ट्री जाना पड़ेगा बॉस के सामने। अब कौन ही चाहेगा बॉस के सामने जाना जबकि आज के दिन का काम पूरा कर चुका हो। हम भी वही सोच रहे थे। थोड़ी देर समय बिताने के बाद हम साइट से निकले और वापसी के सफर के लिए निकल पड़े। रास्ते में निर्माण कार्य प्रगति पर था। अहमदाबाद शहर घनी आबादी का शहर है और घनी आबादी होने की वजह से रोड पर ट्रैफिक जाम होना आम बात है। जिस रोड से हम अहमदाबाद शहर की ओर बढ़ रहे थे वो रोड राजकोट,जामनगर, भावनगर जैसे कई बड़े शहरों को जोड़ती है। उधर से आने वाली सरकारी बसें और निजी कारें साथ ही नौकरी करने वाले लोगो की गाड़ियों ने जाम लगा दिया। हालांकि इस समस्या के निदान के लिए सरकार उस रास्ते में एक फ्लाई ओवर ब्रिज बना रही है ताकि ट्रैफिक बंट जाए और किसी को देर ना हो और न ही कोई ऊबे। हम तो बिलकुल रुके नहीं थे जैसे की खंभा एक जगह रुक रहता है जमीन में धंसा हुआ। धीरे धीरे आगे बढ़ ही रहे थे लेकिन ऊबने जरूर लगे थे। राकेश भाई गाड़ी चला रहे थे और उनका ध्यान ट्रैफिक और ड्राइविंग पर था। मैं अपनी उबाई दूर करने के लिए फ्लाईओवर और आस पास के नजारे देखने में लग गया। आखिर मैं गाड़ी चलाने पर ध्यान देकर क्या ही करता। इतनी धीमी रफ्तार में मुझे कुछ मार्गदर्शन देने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मेरी नजरें नज़ारों को देखते देखते एक कार की खिड़की पर जा रुकी। उस खिड़की से 2 प्यारे प्यारे हाथ बाहर निकल कर नृत्य का हाथों द्वारा किया जाने वाला स्टेप कर रहे थे। हम थोड़ा आगे बढ़े तो मैने देखा उन हाथों में तो मेहंदी की लाली थी। छोटे छोटे नाज़ुक से कोमल पतले हाथ शहर की भीड़ भाड़ और ट्रैफिक जाम की पें पें को नजरंदाज करते हुए अपनी ही धुन में रमे हुए थिरक रहे थे। वो एक छोटी बच्ची थी जो शायद किसी फंक्शन या शादी से वापस आ रही होगी अपनी फैमिली के साथ। उसके पैरेंट्स ट्रैफिक जाम से परेशान होंगे लेकिन उस बच्ची को इससे कोई मतलब नहीं था। उसे तो बस हर पल का आनंद लेना आता था। भीड़ भाड़ से उसे कोई रोक नहीं रहा। वो सोना चाहे तो गाड़ी में सो सकती है। चिप्स कुरकुरे जो चाहे खा सकती है। सुकून की असली परिभाषा तो उसे देख कर ही मालूम हुई। जो हम जिंदगी की भाग दौड़ में को चुके हैं। उस बच्ची हो अपने भविष्य की कोई चिंता ही नहीं है क्योंकि अभी उसने दुनिया को जाना ही कितना है। घूमना फिरना,खेलना कूदना,पढ़ना लिखना,मौज मस्ती यही सब तो उसने अभी तक सीखा है। जिम्मेदारियों की उमर तो अभी तक हुई नही। मम्मी ये चाहिए, पापा वो चाहिए,यहां घूमने जाना है, वो खाना है, बस मांग रखना जानती है और मां बाप मांग पूरी करेंगे ही। आखिर उनके दिल का टुकड़ा जो है। मां बाप अपनी जिम्मेदारियों और तकलीफों का अहसास बच्चों को नही होने देते। वो नही चाहते की हमारे बच्चे पढ़ने लिखने की उमर में टेंशन और डिप्रेशन के शिकार हो जाएं इसलिए अपनी तकलीफें नजरंदाज करते हुए बच्चों को सारी खुशी देने की कोशिश करते हैं। और इसी बात का एक प्रतिबिंब मेरी नजरों के सामने था। जो मुझे उस मेहंदी लगे हुए मुलायम हाथों को हंसिनी की तरह मुद्राएं दिखाती हुई बच्ची के सुकून के पलों में दिखा। कुछ पल के लिए तो मैं भी अपने बचपन और उसके सुकून में खो गया। और जब वापस वर्तमान के हालात पर आया तो मन में एक ही खयाल आया कि मैं इतनी जल्दी क्यों बड़ा हो गया, मैं इतनी जल्दी क्यों बड़ा हो गया।
Mai electronics engineer hun aur private company me site engineer ki post par job karta hun. Mujhe s...