कुमार किशन कीर्ति 14 Apr 2025 कहानियाँ समाजिक रोटी,कीमत 42780 0 Hindi :: हिंदी
"यह कैसी रोटी बनाई हो!"इतना कहकर मोहन ने नाक सिकुड़ा।यह सुनकर उसकी मां निर्मला तो हैरान रह गई।दरअसल, मोहन को रोटी खाना पसंद नहीं था। उस दिन उसके घर चावल खत्म हो गया था और उसके पिता जानकीनाथ बाजार से चावल और हरी सब्जियां इत्यादि लाने गए हुए थे। रोटी देखकर मोहन ने बहाने बनाए।
मगर, निर्मला को अपने बेटे मोहन का स्वभाव बिल्कुल भी ठीक नहीं लगा।किंतु,वह बड़े ही प्यार से अपने बेटे को समझाते हुए बोली"बेटा,जिस रोटी को तू देखकर नाक सिकुड़ रहा है ना!उसी रोटी के लिए किसान दिन_रात खेतों में काम करता है। चंद रोटी की टुकड़े के लिए यह दुनियां कर्म _कुकर्म सब कुछ करती है।
जिसके घर में रोटी नहीं होती है,उस घर के लोग तो आंसू बहाते है।"
इतना कहकर वह शांत हो गई।मोहन तो कुछ भी नहीं बोला,बस अपनी मां की बातों को सुनता रहा।फिर निर्मला बोली"बेटा,अन्न कोई भी हो। हमें प्रेम से खाना चाहिए।"इतना कहकर निर्मला अपने बेटे के सिर पर प्रेम से हाथ रखी।यह सोचकर कि अब उसका बेटा सब कुछ समझ गया होगा।
: कुमार किशन कीर्ति।