Pagal Sunderpuria 30 Mar 2023 कहानियाँ समाजिक परवाना आशिक़, हिंदी कहानी, पागल सुंदरपुरीया, pagal Sunderpuria, hindi story, pagal shayar, parvana aaahiq 68131 0 Hindi :: हिंदी
शहर में रहने वाले मजदूर परिवार की मुखिया जानकी देवी के दो पुत्र व एक पुत्री थी, सभी बच्चे अपनी मां को बहुत प्यार करते थे और जानकी देवी भी सभी बच्चों को प्यार करती थी। बड़े पुत्र का नाम वासुदेव व छोटे पुत्र का विजय एवं सबसे छोटी पुत्री का नाम रजनी था, लेकिन पति का स्वर्गवास टीबी की बीमारी के चलते रजनी के जन्म के तीन साल बाद ही हो गया था, जब वासुदेव छठी कक्षा में और विजय तीसरी कक्षा में पढ़ता था, इस कारण अकेली जानकी देवी लोगों के घरों में साफ सफाई करके बड़ी मुश्किल से बच्चों का पालन करती लेकिन काम करते वक्त उसे नन्ही रजनी बहुत तंग करती। एक दिन उसने सोचा कि वासुदेव व विजय को रविवार की छुट्टी है, आज रजनी को इनके पास घर छोड़ देती हूं। जानकी देवी ने वासुदेव और विजय से कहा आज रजनी तुम दोनो भाइयों के पास घर पर रहेगी इसका ख्याल रखना। विजय ने कहा ठीक है मां, बहन का ख्याल बड़े भैया रख लेंगे मैं तो अपने दोस्तों के साथ खेलने जाऊंगा, लेकिन वासुदेव कहने लगा मां रजनी रोज तुम्हारे साथ सारा दिन रहती है अगर इसको तुम्हारी याद आयी तो रोएगी फिर मुझसे चुप नहीं होगी इसलिए मैं रजनी तुम्हारे साथ चलेंगे, जानकी देवी ने विजय को कहा, विजय तेरा खाना अंदर पड़ा है समय पर खा लेना, वासुदेव और रजनी मेरे साथ जा रहें है, विजय ने कहा ठीक है मां, जानकी देवी ने तीन साल की रजनी को गोद में उठाया और वासुदेव को साथ लेकर काम पर चल दी, ग्यारह साल का वासुदेव खुशी खुशी साथ चलता रहा और मन ही मन अपने ख्यालों से आसमान को छूने लगा कि आज मां मुझे बाज़ार से बहुत कुछ खिलाएगी, जिनके घर काम जानकी देवी पहले करती थी वह घर आ गया था, जानकी देवी ने कहा वासुदेव लो बहन को पकड़ो, जानकी काम करने लगी व दोनों भाई बहन खेलने लगे, खेलते खेलते वासुदेव अपनी मां की और कभी कभार देखता रहा। जैसे ही उस घर की साफ सफाई काम जानकी देवी ने पूरा कर दिया उस घर की मालकिन ने जो रात का बचा हुआ खाना जानकी को दे दिया उसके बाद जानकी बच्चों को साथ लेकर दूसरे घर की और निकल पड़ी, दूसरे घर में भी साफ सफाई का कार्य जल्दी-जल्दी हो गया क्योंकि आज वासुदेव के साथ होने रजनी ने उसे तंग नहीं किया, उस घर से भी जानकी को रात का बचा हुआ खाना मिला, तीसरे घर की और जाते हुए रजनी रोने लगी क्योंकि उसे भूख लगी थी वह तो वसुदेव को भी लगी थी लेकिन वह बता नहीं रहा था, जैसे ही सड़क पर एक तरफ पेड़ आया जानकी देवी ने उस पेड़ की छाया में बैठकर दोनों बच्चों को उस खाने में से खाना खिलाया जो उसे दोनों घरों से मिला था, खाना खाते खाते वासुदेव बोला मां भी खा लो? जानकी ने कहा मुझे अभी भूख नहीं है बेटा। खाना खाने के बाद फिर तीसरे घर जाकर काम किया और चौथे घर बच्चों को साथ लेकर जैसे ही पहुंची, आरती (उसकी मालकिन) ने देखते ही पूछा जानकी आज तुम बहुत जल्दी आ गई? हां दीदी आज लड़कों को छुट्टी थी एक लड़का साथ आ गया इसने आज रजनी को संभाला और मैंने जल्दी जल्दी काम निपटा दिए, आरती अच्छा चल पहले चाय बना जानकी खुद भी पीले और मुझे और बच्चों को भी पिला। जानकी देवी ने चाय बनाई और सभी को पिलाई, और खुद ने पहले खाना खाया साथ ही साथ चाय पी, आरती घर में जानकी देवी इसलिए सबसे आखिर में आती थी क्यूंकि दूसरे घरों से ज्यादा काम करती थी काम करते करते शाम के सात भी बज जाते थे। साफ सफाई, कपड़े धोना, खाना बनाना आदि सारे काम करती थी, आरती का पति एक व्यपारी था जो सुबह जाता शाम को आता था, एक बेटा था अंकुश जो वासुदेव से तीन चार साल छोटा था, पहले ही दिन अंकुश ने वासुदेव को दोस्त बना लिया, जैसे ही रजनी सो गई दोनों खेलते रहे, शाम को जब जानकी देवी ने सारे काम निपटा दिए तो आरती से कहा दीदी अब मैं जाऊं? आरती बोली…. बचा हुआ खाना ले जाना…। जी दीदी, और जो पुराने कपड़े अंकुश नहीं पहनता उन्हें अलग रखा था ना? जानकी देवी हां दीदी..। उसे भी ले जाना तेरे बच्चे पहन लेंगे।, जानकी देवी जी दीदी..। सारा समान लेकर जानकी और बच्चे घर आ गए, विजय ने सभी आते देख खुश होकर कहा आज तो खेलने का मज़ा आ गया। जानकी देवी विजय का चेहरा सहलाते हुए, अच्छा बदमाश..। चलो आओ पहले सब नहालो, फिर खाना खाएंगे, फिर सभी नहाकर खाना खाकर मां के साथ सोना चाहते थे, उससे पहले जानकी देवी ने कहा तुम दोनों मेरी एक एक टांग को पैरों से दबाओ, दर्द कर रहीं हैं, विजय दबाते दबाते मां तुम थक क्यूं जाती हो? वासुदेव क्यूंकि मां सारा दिन काम करती है इसलिए..। विजय मां तुम इतना काम मत किया करो? जानकी देवी ने कहा जीवन गुजारने के लिए रुपयों की जरूरत होती है और रुपए काम करने से आतें हैं। विजय और वासुदेव दोनों एक साथ बोले फिर तो हम भी रोज काम करने तुम्हारे साथ जाया करेंगे और बहुत धन कमाएंगे, जानकी देवी ने कहा अभी तुम्हारी पढ़ने की उम्र है पढ़ो, अगर अच्छे से पढ़ लिए बड़े अफसर बन जाओगे, पता है अफसरों को बहुत पगार मिलती है, तुम पढ़ लिखकर बड़े बाबू बनना, चलो अब सो जाओ, सुबह जानकी देवी उठी और अपनी दैनिक कार्य अनुसार काम पर जाती रही, बच्चे पढ़ते रहे जिस दिन वासुदेव को स्कूल की छुट्टी होती वो जानकी देवी के साथ जाता अपने अंकुश दोस्त से खेल आता और आपनी मां के काम में भी मदद करता, रजनी बड़ी हो गई और वो भी पढ़ने लगी थी, पढ़ने में तीनों भाई बहन होशियार थे, लेकिन वासुदेव को छुट्टी वाले दिन अपनी मां का सहयोग करना अच्छा लगता था, एक दिन आरती के घर फर्श को धोते वक्त जानकी देवी गिर गई और कमर में चोट लग गई, उसे आरती ने अपने पति को फोन करके घर बुलाया और जानकी देवी को हस्पताल लेकर गए और भर्ती करवाया और जानकी देवी के भाई को फोन कर दिया शाम तक जानकी देवी के भाई और भाभी हस्पताल आ गए व आरती का पति पहले जानकी देवी के बच्चों को हस्पताल लाकर उनकी मां से मिलवाया, मां को देख बच्चे रोने लगे, बच्चों को आरती ने कहा रोना नहीं हम सब मिलकर भगवान से प्रार्थना करें कि तुम्हारी मां जल्दी ठीक हो जाए, जानकी देवी बच्चों से बातें करने लगी और कहा मैं जल्द ठीक हो जाऊंगी, अब तुम अपनी मामी के साथ घर जाओ मेरे पास तुम्हारे मामा रहेंगे, सभी बच्चे ठीक है मां, वासुदेव बात सुन… जानकी देवी ने कहा। हां मां वासुदेव बोला, बेटा जब तक मैं घर ना आ जाऊं तुम स्कूल से छुट्टी ले लेना और सब घरों का काम करके आना तूं बड़ा है और तुझे काम के बारे में पता भी है। वासुदेव ठीक है मां, विजय और रजनी को स्कूल भेज देना। वासुदेव जी मां, यह बोलते सब घर की और निकल पड़े, अपनी मां की दी हुई सभी जिम्मेदारियां वासुदेव ने संभाल ली, अपने व जिन घरों में उसकी मां जो जो काम करती थी वो सारे काम अब वासुदेव करने लगा, पांच दिन बाद जानकी देवी हस्पताल से घर जाने की अनुमति मिली लेकिन डाक्टर ने बोला कि कम से कम एक माह का चलने फिरने का परहेज़ रखना है उसके बाद भी ज्यादा वजन वाला काम नहीं करना है हस्पताल का सरा बिल आरती के पति ने दे दिया, और जानकी खा तुम्हारा बेटा वासुदेव बहुत नेक है चिंता मत करो एक महीने की तो बात है, तुम्हारा बेटा वासुदेव तुम्हे कोई परेशानी नहीं आने देगा, वह बहुत मेहनती है। वैसा ही हुआ वासुदेव ने अपनी मां को एक महीने तक कोई काम नहीं करने दिया, एक महीने के बाद जानकी देवी ने वासुदेव को कहा बेटा आज से तुम स्कूल जाया करो अब मैं काम कर लिया करूंगी, वासुदेव ने कहा ठीक है मां, वासुदेव तैयार होकर अपने छोटे भाई बहन के साथ स्कूल चला गया लेकिन आज उसे पढ़ना अच्छा नहीं लगा। शाम को सारी बात अपनी मां को बताई। मां ने कहा कोई बात नहीं एक दो दिन बाद पढ़ाई में मन लगने लग जाएगा। मां के कहने पर वासुदेव स्कूल तो जाता पर उसे अच्छा नहीं लगता, उसे अपनी मां की मेहनत याद आती रहती थी। एक दिन वासुदेव ने अपनी मां को कहा मां मैंने नहीं पढ़ना मैं तो कोई काम ही करूंगा, मां के लाख समझाने पर भी वासुदेव नहीं माना, और अपनी मां से कहने लगा कि मैं इतना धन कमाऊंगा कि विजय और रजनी को बड़े स्कूल में दाखिला करवाऊंगा, जानकी देवी ने कहा मैं अच्छे से काम के बारे में पता करूंगी, वासुदेव ठीक है मां पर आज मैं तुम्हारे साथ चलूंगा, मां ने कहा ठीक है। रोज की तरह सारे घरों का काम निपटाकर आरती के घर पहुंचे और दोनों मां बेटा काम करने लगे। आरती ने कहा वासुदेव तुम स्कूल नहीं गए आज? आंटी जी अब मेरा स्कूल जाने को मन नहीं करता, अब मैं मां के साथ काम किया करूंगा, आरती ने कहा जानकी तुम्हारा बेटा क्या बोल रहा है? जानकी देवी बोली हां दीदी मैंने इसे बहुत समझाया है ये मान ही नहीं रहा। आरती अच्छा, फिर आरती ने भी वासुदेव को समझाया पर वासुदेव अपनी बात को पलट नहीं पाया। आरती ने कहा अगर काम करना है तो तुम्हे अच्छी नौकरी पर लगवाएंगे, आरती ने अपने पति को फोन किया और वासुदेव को अच्छी नौकरी दिलवाने को कहा, आरती के पति ने दो घंटे बाद फोन किया और कहा मेरे दोस्त की कपड़े की दुकान पर लड़के की जरूरत है, वह उसे पंद्रह सौ रुपए पगार देगा और जैसे जैसे काम सीखेगा पगार बढ़ती रहेगी। अगली सुबह से वासुदेव कपड़े की दुकान पर काम करने लगा, दूसरे साल ही अपनी मां को दूसरों घरों में साफ सफाई का काम करना बंद करवा दिया। वासुदेव को जब काम करते करते कई साल गुजरने के बाद दुकान के मालिक ने कहा इस बार तुम्हारी पगार पांच सौ नहीं बड़ाऊंगा। वासुदेव ने कहा जी मालिक। यह बात सुनकर दुकान मालिक खुश हुआ और कहा वासुदेव अब तुम पूरा काम सीख गए अब तुम्हारी पगार बारह हजार रुपए करता हूं। अब इस दुकान को चलाना तेरी जिम्मेवारी है। वासुदेव शाम को सबके लिए मिठाई लाया और कहा मेरी पगार इस बार तीन गुणा बढ़ गई है, सब खुश हुए। वासुदेव ने कहा इस बार 12वीं के बाद विजय को बड़े कॉलेज में दाखिला करवाऊंगा। ऐसा ही होता है। जब भी वासुदेव को जानकी देवी शादी के लिए रिश्ते आने की बात कहती, वासुदेव यह कहकर मना कर देता जब तक विजय और रजनी को नौकरी नहीं मिलती मैं शादी नहीं करवाऊंगा। सबके बार बार कहने पर भी नहीं मानता। क्यूंकि वासुदेव जानता था कि उसके शादी करने के बाद एक परिवार बढ़ेगा तो खर्चा बढ़ेगा, इससे भाई बहन की पढ़ाई खराब हो जाएगी, इसलिए उसने प्रण लिया कि जब तक दोनों की कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी नहीं मिल जाती हैं। तब तक शादी नहीं करूंगा। विजय और रजनी की कड़ी मेहनत को बल मिलता जब वो अपने बड़े भाई वासुदेव के इस त्याग और संकल्प को देखते, अपनी मां और बड़े भाई वासुदेव द्वारा दी गई हर खुशी को विजय और रजनी सौ गुणा अधिक बड़ाकर देना चाहते थे और अपने लक्ष्य को प्राप्त करना ही उनका मकसद था। एक दिन ऐसा आया रजनी एम. बी. बी. एस. की पढ़ाई पूरी करने के बाद डाक्टर बन गई। और विजय आई ऐ एस का पेपर पास करके कलैक्टर बन गया। घर में खुशियां ही खुशियां थी सिर्फ़ दो दुखों के बिना पहला बच्चों के बाप का ना होना। दूसरा वासुदेव का बगैर शादी रहना। अब वासुदेव की उम्र भी ज्यादा हो गई थी। कोई लड़की वासुदेव के लिए नहीं मिल रही थी। उधर दूसरी तरफ विजय की कॉलेज की दोस्त उससे जल्द शादी करने का दबाव डाल रही थी, क्यूंकि उसके माता पिता नहीं तो दूसरी जगह शादी करने की बात बोल रहे थे, विजय इस बात को महीने भर तो दबाता रहा आखिर उसने अपनी मां को बोल दिया। मां ने कहा पहले वासुदेव की शादी तो जाए तुझसे तो कोई भी लड़की शादी कर लेगी। विजय जी मां कहकर अपने कमरे में बैठ गया, वासुदेव को जैसे ही पता चला उसने विजय को डांटा और कहा मुझे क्यूं नहीं बताया। सॉरी भैया बोलकर चुप हो गया। वासुदेव ने विजय से कहा सुबह जल्दी उठना और सभी को तैयार कर लेना हम नया मकान देखने चलेंगे, पुराने घर को देखकर वो रिश्ता नहीं करेंगे। विजय ने खुश होकर सभी को यह बात बताई और कहा अब सो जाओ सुबह जल्दी जाना है । अगले दिन सब टैक्सी में बैठकर नया घर देखने गए कई घर देखने के बाद एक दो मंजिला मकान पसंद आया ओर उसे खरीद लिया। फिर विजय की शादी उसकी कॉलेज की दोस्त कंगना से हो गई। विजय की शादी में वैसे तो बहुत मेहमान थे लेकिन वासुदेव व उसकी मां जानकी देवी के खास मेहमान आरती का परिवार था। आरती व उसका पति जानकी देवी के बच्चों की तरकी से बहुत प्रभावित था। जब आरती को यह पता चला की जानकी की बेटी ने डाक्टर की डिग्री की हुई है उससे रहा न गया। उसने रजनी की मां को कहा। जानकी कुछ बात करनी है। जानकी देवी ने कहा जी दीदी। जानकी हमारा जो पहले का रिश्ता है इसे हमें और मजबूत कर लेना चाहिए। मैंने पति से बात कर ली है कि तुम हमारी संबंधन बन जाओ, अपनी बेटी रजनी का रिश्ता मेरे बेटे अंकुश के साथ करदो, अंकुश भी डाक्टर बन गया है और अपना हॉस्पिटल चला रहा है। यह सुनकर जानकी की आंखों में आसूं आ गए। पास से गुजरते वासुदेव ने देखा तो दौड़ा चला आया । मां क्या हुआ। क्यूं रो रही हो? जानकी देवी खुशी के आसूं वासुदेव सुन तेरी आरती आंटी क्या कह रही है? आंटी क्या बात है? आरती… वासुदेव अंकुश भी डाक्टर बन गया है अपना खुद का हॉस्पिटल चला रहा है। रजनी भी डाक्टर बन गई इसलिए अंकुश के लिए रजनी का रिश्ता चाहिए, मना तो नहीं करोगे? नहीं आंटी रजनी मेरी बहन है और अंकुश मेरा बचपन का दोस्त, बेशक मुझसे छोटा था लेकिन हम दोनों साथ खेलें है। हमें और क्या चाहिए। लेकिन उससे पहले अंकुश और रजनी की सहमति जरूरी है। वासुदेव ने रजनी और अंकुश दोनों को बुलाया और अंकुश और रजनी से कहा कि आंटी और मां तुम दोनो के रिश्ते की बात रहीं हैं। तुम पढे लिखे हो। तुम्हारी ज़िन्दगी के बारे में तुम बेहतर फैसला लोगे, मुझे अच्छा लगेगा। कोई दबाव नहीं। अंकुश और रजनी जी कहते हुए अपनी अलग हो गए। लेकिन एक दूसरे के बारे में सोचने लगे कुछ दिनों बाद अंकुश और रजनी मिलने लगे और एक दूसरे को समझने के बाद रिश्ते के लिए अपने अपने घर में दोनों ने शादी के लिए हां करदी। एक माह बाद अंकुश और रजनी की शादी हो गई। अंकुश और रजनी मिलकर अपना हॉस्पिटल चलाने लगे। सभी तीनों परिवार खुशी खुशी रहने लगे। लेकिन वासुदेव की शादी नहीं हो पाई, सभी को यह दर्द सताता था लेकिन वासुदेव हमेशा खुश रहता था और कहता था मेरा प्यार जीत गया, वासुदेव आशिक़ अपने परिवार के सुख और खुशी से प्यार करता था। इसलिए वासुदेव को हर दुख अपनी मोहब्बत में छोटा लगने लगा। वासुदेव ने पूरी ज़िन्दगी परवाना आशिक़ बनकर गुज़ार ली। ज़िन्दगी के आखिरी पल तक अपने प्यार के लिए कुर्बान होता रहा, परवाना आशिक़..! लेखक पागल सुंदरपुरीया 9649617982