Rambriksh Bahadurpuri 29 Jun 2024 कहानियाँ समाजिक #Rambriksh Bahadurpuri#Ambedkar Nagar poetry#social stori Prashnchihna 41325 0 Hindi :: हिंदी
कहानी
प्रश्न चिह्न
यदि आंखों को बादल और झर झर झरते आंसू को मुसलाधार बारिश तथा वक्त को आषाढ़ का दिन कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इकट्ठा चारों ओर से घेरे जिनके बीच महिला जिसके आंखों से आंसू रुकते नहीं थे, हूं हूं,हो हो,हाय हाय के सिवा वह मूक सी ध्वनि शून्य एक टक लोगों को देखती मानों उसकी सब कुछ उसके आंखों के सामने ही छिन गया हो,जल गया हो या लुट गया हो। फिर भी पास में बैठी महिलाएं अपने आप को असहाय महसूस करते हुए बिना रोते उसके सहारा और सान्त्वना के लिए ढांढस और दिलासा दे रही थीं - रोओ न,धैर्य रखो, धैर्य रखो सब ठीक हो जाएगा और अपने आंचल से उस महिला के आंसू को पोंछा करती थीं और अपने भी। वहां इकट्ठे भीड़ के आंखों में आंसू थे,सभी सिसकियां लेते पर कोई किसी से कुछ न पूछता कि क्या हुआ?क्योंकि उस मां पर बीती घटना किसी से छिपी नहीं थी।सभी के व्यथित हृदय की पीड़ा भावनाओं से होकर आंखों में आंसू बनकर गिरने के सिवा और कुछ नहीं था।
पुलिस कब आयेगी? कोई तो 112 नम्बर पर फोन किया था, भौंचक्का धबड़ाया एक व्यक्ति छटपटाता हुआ सभी से ऐसे पूछा जैसे कि स्वयं, स्वयं से ही पूछा हो ,पर कौन बताता? किसी को भी स्पष्ट कुछ पता नहीं था सभी एक दूसरे को देख रहे थे। जो जहां पर सुनता वहीं से चल पड़ता और धीरे धीरे भीड़ बढ़ने लगी,अरे कैसे हुआ! कब हुआ! गजब हो गया! ऐसे रहा तो कोई अपने बच्चियों को कहीं कैसे भेजेगा? सरकार के इतनी सुरक्षा के बाद भी हमारी बच्चियां सुरक्षित नही हैं अब हम क्या करें! तभी एक महिला ने पलट कर रोष और पलटवार मुद्रा में झट से बोल पड़ी अरे! हां, सरकार ने जितनी सुरक्षा की है वह तो वही जानता है जिसके ऊपर बीतती है। आज पचहत्तर बरिस हो गइल देश आजाद भये, संविधान लागू भये, जेह मां नारी के सुरक्षा व्यवस्था कै कड़ी से कड़ी विधान है पर आज के नेतन कै खाली भाषण सुनौ ,बड़ा बड़ा बैनर मां चौड़ा चौड़ा फोटो छपवाय कै बतावत हैं कि बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ। हम बेटी किससे किससे बचाएं? कैसे बचाएं? कहां कहां बचाएं? और तो और, कब कब बचाएं? और सरकार इतनै सुरक्षा के बारे में सोंचत तो अभी तक पुलिस काहें नाही आइल? ,बात तो तुम्हारी भी सही है - बगल से एक आदमी सिर हिलाकर बात को स्वीकारते हुए कहा।
तभी सायरन की आवाज सुनाई दी सभी ने संतोष की सांस ली तब तक पुलिस गाड़ी से उतर कर भीड़ के पास पहुंची। कुछ लोगों ने धबड़ाए हुए, पुलिस को उस मां की ओर इशारा की और भीड़ को हटाते हुए आगे बढ़े। कुछ लोगों ने साहब साहब कहते चार पाई भी बिछा दी। पर वे सबसे पहले उस मां के पास पहुंचे जो मात्र एक टक देखने के सिवा कुछ भी कहने में अस्मर्थ थी वह बार बार सबको पलट पलट कर ऐसे देखती जैसे कि कुछ खो गया हो या किसी ऐसे जगह आ गयी हो जहां अपना कोई न हो। पास में बैठी महिलाओं ने उसे सम्हालते हुए बताया कि देखो पुलिस आयी है। तुम्हारी दुखड़ा अब पुलिस सुनेगी, तुम्हें न्याय मिलेगी। शून्य शिथिल मां की शरीर कंपकंपाने लगी जैसे कि जमे हुए रक्त फिर से दौड़ने लग गये हों, आंखों की पुतली में गति आ गयी हो ,कपकपाते ओठों से एक धीमी सी स्वर निकला-कौन? पुलिस!,और तेजी से सांस खींचकर ऊंचे स्वर में कुछ कहना चाही पर फिर से उसी शून्य अवस्था में अचेत होकर गतिहीन हो चुकी थी। पुलिस भी क्या करती? लोगों से पूछताछ कर कुछ जानकारियां ली और उस असहाय बेबस मां के अधमरे परिवार से थाने आने को कहा फिर गाड़ी पर बैठे और चले गए।
थाने के बाहरी गेट के ठीक सामने एकत्रित भीड़ से शोर के रुप में एक ही आवाज गूंज रही थी पुलिस प्रशासन मुर्दावाद,यह सरकार निकम्मी है मुर्दाबाद मुर्दाबाद। खाट पर सोलह सत्तरह साल की सयानी लड़की की लाश को दो व्यक्तियों ने कंधे पर टांगें खड़े-खड़े भगवान से सहायता की दुहाई की भीख मांगते हुए कभी हे राम! हे भगवान! कहते तो कभी पागल सा होकर मूर्दाबाद मुर्दाबाद बोलते। पर थाने से कोई भी पुलिस या उससे बड़ा अधिकारी बाहर नहीं लिकल रहा था। या तो उन्हें इस घटना की जानकारी पहले से थी जिसमें वे कारवाई करने से मुह चुरा रहे थे और जानबूझ कर हिल्लाहवाली कर मामले को टालना चाहते थे। मां रो रो कर चिल्लाते हुए बार बार सभी पुलीसों को कोसते हुए कहती अरे! निकम्मों तू कैसा पुलिस है? तू किस लिए नौकरी किया है? तू सब अंधा है? तुम्हें दिखता नहीं है? मेरे कलेजे का टुकड़ा आज मुझसे दूर हो गयी। कितने बेरहमी से उसके बदन को नोचा घसोटा गया है निर्वस्त्र कर दिया गया। अरे! हरामखोरो तुझे किसी बेवा,अनाथ और असहाय की पीड़ा नहीं दिखती। थाने से बाहर क्यों नहीं आता। पूरी भीड़ के लोगों में मानो आग दहक रही हो सभी क्रोध से तिलमिलाये आपे से बाहर हो रहे थे। तभी एक पुलिसकर्मी बाहर निकल कर पास आकर बोला- इसमें से ग्राम प्रधान कौन है? जी साहब मैं। राम गगन।
ठीक है,तुम आओ साहब तुम्हें अंदर बुला रहे हैं। प्रधान जी पुलिस के पीछे-पीछे साहब के पास पहुंचे और साहब से झुककर बोले -साहब जय हिंद। साहब ने प्रधान जी के हाव-भाव और परसानिलिटी से ही पहचान गये थे कि यह कौन और किस जाति के हो सकते हैं। और फिर बैठने के लिए इसारा की। फिर प्रधान की ओर ध्यान से देखते हुए पूछा - तो प्रधान जी इस घटना के बारे में आप क्या जानते हैं? साहब यह एक गरीब परिवार से है। इसके पति नहीं हैं। क्यों कहां चले गये? साहब ने कुछ लिखना छोड़कर झट से सिर उठा कर पूछा। साहब! इसके पति के मरे हुए लगभग एक साल हो गये। यह महिला एक तीन साल के बेटे और इस सोलह सत्तरह साल की बेटी के साथ अपनी जीवन को काट रही है। इधर उधर इनके उनके यहां मजदूरी करके बच्चों को पाल रही है।सायद इस आशा से कि ये बच्चें इनके बुढ़ापे का सहारा बने। उस महिला को बुलाओ,साहब ने पास में खड़े उस पुलिस से कहा। पुलिस ने तुरंत महिला को बुला कर लाया। महिला रोती बिलखती साहब के सामने खड़ी हुई,साहब मुझे न्याय दो, मैं कहां जाऊं? क्या करुं कुछ समझ में नहीं आ रहा है आंखों से आंसू सूख चुके थें। वह रोती छटपटाती फिर भी आंखों में आंसू नहीं।साहब ने तुरन्त लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजवाया और उस महिला को सांत्वना दी कि घबड़ाओ नहीं हम देखेंगे।
सभी इंसान एक जैसे नहीं होते। कुछ जो सीधे सादे तो दिखते हैं पर होते नहीं और कुछ जो देखने में गुस्सैल स्वभाव,कई बातों का एक जबाब,रूखा और कड़ा भाषा शैली का प्रयोग पर आंतरिक रूप से बहुत ही सहयोगी स्वभाव के होते हैं। कई सवालों का एक जबाब इस लिए कि उन्हें दंगल फसल की बातों में कोई रुचि नहीं होती और कड़ा स्वभाव का होना यह बताता है कि हमेशा अपने कार्यों के प्रति समर्पित और सतर्क हों। उस साहब का भी यही चरित्र था। चूंकि घटना की पूरी जानकारी पुलिसकर्मियों द्वारा साहब तक पहुंच ही नहीं पायी थी किन्तु अब महिला को एक बड़ी आशा की द्वीप जलते दिखाई दी फिर भी दूर थी। महिला असंतोष लिए,हृदय में धीरज बांधे सभी जनों के साथ वापस आ चुकी थी।
कई घंटों बाद लाश घर पर लायी गयी। फिर से वही रोना धोना। पर कोई कब तक रोता। लाश को दफनाया गया। मां का ह्रदय अब धीरे-धीरे स्वीकार कर चुका था कि मरे हुए लोग वापस नहीं आते। पर हा सांत्वना और साहस दिलाने के खातिर एक के बाद एक नेता और गांव के कुछ सम्भ्रांत लोग आते जाते रहें। पर जब कोई मिलने आता तो मां के ह्दय की स्पंदन बढ़ जाती। उस लाचार मां की रुदन और कराह सुन कर लगता मानों कलेजा फट सा जाता। क्यों न रोती? जब कोई किसी बिमारी से मरता तो उसे डाक्टर को दिखाया जाता दवाई चलती पास में बैठ कर बातें करता। मन को संतोष होता कि प्रयास किया गया पर क्या करें? भगवान को मंजूर नहीं था। यहां तो उस बच्ची के साथ जो हुआ वह पूरे जनसमूदाय,समाज के लिए शर्मनाक था।लाश के साथ पोस्टमार्टम की रिपोर्ट भी जिसमें साफ साफ लिखा था कि उस बच्ची के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ है।
कई दिन बीत चुके हैं अभी तक कुछ मालूम नहीं चला,बेटा कुछ खबर है क्या? गांव का एक बुजुर्ग व्यक्ति ने पूछा। अभी तक तो नहीं दादा- दूसरे ने जबाव दिया। पुलिस खोज कर रही है। क्या जमाना आ गया है सारे रिस्तें ,सम्बंध,नाता सब खाक में मिल जा रहे हैं कोई बहन बेटी को नहीं पहचान रहा है। यह दुनिया कहां जायेगी! अत्याचार कब रुकेगा? बेटी के जन्म लेने से तो वैसे ही बाप बोझ तले दब जाता है। ऊपर से समाज के ऐसे बिगड़े बाप के औलाद, नालायक पैदा होकर बेटियों का जीना मुश्किल कर देते हैं। और तो और यदि बेटी गरीब के घर जन्म ली तो लगता है पिता, पूर्व जन्म का पाप भोग रहा है। दादा ने मन ही मन पछताते बड़बड़ाते जाने लगे तभी पास में खड़ा व्यक्ति बोल पड़ा - दादा बात तो आप की सही है पर सब कुछ ऐसा नहीं है। न ही सब कोई ऐसे ही हैं। पर इस घटना के आगे सारे नियम कानून और सिद्धांत सब बेकार और झूठे लग रहे थें। वह युवक कुछ कहते कहते रुक गया और चुप हो गया।
एक सप्ताह बाद प्रातः तड़के ही खबर गांव में फैल गयी कि उसी गांव में पुलिस दो लड़कों को पकड़ कर ले गयी। पर किस कारण से किसी को कोई पता नहीं था।
थाने से पता चला कि उस लड़की का इन्हीं दोनों ने बलात्कार किया। पुलिस इन्हें कैसे पकड़ी? कैसे जान पायी कि बलात्कार इन्हीं लोगों ने ही किया? गांव में खुशफुसाहट होने लगी। किसी ने कहा कि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं। पुलिस से कोई बच नही सकता। पर हां जब पुलिस चाहें तब नहीं तो आज के जमाने में तो रिश्वत ऊपर की कमाई समझा जाने लगा है। लोग पढ़ लिख कर ऊपर की कमाई के लिए ही पुलिस की नौकरी करते हैं दूसरे व्यक्ति ने समर्थन करते हुए जबाब दिया।
उस बेवा लाचार मां को जब यह सूचना मिली तो मानों उसका दूसरा जन्म हुआ हो। उसके अंतर्मन में दुःख के साथ सुख भी स्थान बना लिया था। मां ने शान्ति की सांस ली। कभी भगवान को दुहाई देती तो कभी इंसान को गाली पर गाली के साथ सहानुभूति भी देती उन पुलिस और उन भले गांव के लोगों को जिन्होने इस घटना में उसका साथ दिया।आज भी उस मां को अपने उस बेटी की कमी अखरती है जो उस मां की सहारा थी, मां के जिम्मेदारियों की बोझ उठाती थी। अंदर से वह टूट सी गयी थी। हमेशा वह बच्चों के बीच बच्चों सी बन कर दस कदम आगे ही रहती थी इसलिए कि उसके बच्चें कुछ सीख कर अपने जीवन में आगे बढ़ सके।
किन्तु यह समाज है,समाज में हर किस्म के लोग होते हैं। लड़की के साथ हुए इस अशोभनीय घटना पर भी प्रश्न चिह्न लगा रहे थे।
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I am Rambriksh Bahadurpuri,from Ambedkar Nagar UP I am a teacher I like to write poem and I wrote ma...