DINESH KUMAR KEER 19 Jun 2023 कहानियाँ बाल-साहित्य 30015 0 Hindi :: हिंदी
मासूम बचपन मेरे मन में यदा - कदा यह सवाल उठता कि , " क्या बचपन बिल्कुल ही होशमंद नहीं होता या चालाकी की हद तक होशमंद होता है ?" … मैं अपने माता - पिता की सबसे छोटी संतान था। वैसे अगर बड़ी संतान होने के फायदे हैं तो छोटे होने के भी कुछ कम नफे नहीं हैं। पेशे से हमारे पिता विद्यालय में प्राध्यापक थे। और इस नाते उनका व्यवहार अधिकतर सबसे छात्र एवं शिष्य का ही रहता। जबकि मुझसे वे हमेशा नरमदिली से ही पेश आते रहे। मेरे परीक्षा फल के दिन वे बहुत खुश रहते और उस दिन शाम में हमारे घर में गरमागरम समोसे और जलेबी जरूर मंगवाई जाती। पिता बचपन से ही मुझे दुलार करते। और इसी वजह से वे मेरी घोर गलतियों पर भी मुझे सजा देनें के वक्त खुद को कमजोर बना लिया। इस से संबंधित एक मजेदार वाक्या जिसे आप सबसे शेयर करना चाहता हूं। उन दिनों फिल्मों की सचित्र कथा पुस्तकों में छप कर आया करती। कड़े अनुशासन वाले हमारे घर में खुलेआम वैसी पुस्तकों को पढ़ना तो क्या लाना भी दंडनीय अपराध की श्रेणी में आता था। लेकिन एक दिन किसी सखा से मांग मैं चोरी - छिपे वैसी ही एक पुस्तक पाठ्यक्रम की पुस्तक के बीच में दबा कर पढ़ने में इतना लीन हो गया था। यह भी ध्यान में नहीं रहा कि पिता के विद्यालय से आने का समय हो गया है। घर में प्रवेश करते ही मुझे अध्यनरत देख कर पिता बहुत प्रसन्न हुए थे। वे मेरी पीठ थपथपाने के लिए मेरी ओर बढ़ आए। उन्हें अपनी ओर बढ़ते देख कर मैं हड़बड़ा गई और झटक कर खड़े होने की कोशिश में किताबों के बीच में छिपी वह रंगीन किताब मेरे हाथों से छूट कर सीधी उनके पैरों पर ही गिर पड़ी। उन्होंने झुक कर किताब उठा ली ' तीसरी कसम ' और अपने होशों-हवास खो बैठे। मैं दोनों हाथों से अपने सिर को छिपाए नीचे की ओर झुका जा रहा था यह सोच कर कि , " अब पड़ी कि तब पड़ी " अचानक ही उनका मूड बदल गया , " फिल्म की किताब पढ़ना तो बहुत गलत है पर तुम अच्छा उपन्यास पढ़ रहा हो इस लिए… " बोलते हुए वापस पलट गए थे। मैं आज भी सोचता हूं, क्या सच में फिल्मी गानों वाले उस सचित्र रंगीन किताब को वे उपन्यास समझ रहे थे। या मुझे कम शर्मिन्दा करने के लिए खुद ही जानबूझ कर भूल कर रहे थे ?