Mithun anuragi 03 Nov 2024 कहानियाँ दुःखद कहानी, शायरी, मिथुन अनुरागी, 34888 0 Hindi :: हिंदी
यह कहना कतई दोषपूर्ण नहीं है, कि संपूर्ण मानव जाति का ही नहीं बल्कि जानवरों आदि का पेट भरने वाले अन्नदाता का पेट स्वयं खाली है।
यह कहानी एक मध्यम वर्गीय किसान की है ,जो अपने परिवार के भरण पोषण के लिए कितनी कठिनाइयों का सामना करता है, जिसकी कल्पना भी सोचनीय है ।
महाजन - अरे ओ सुखिया तेरी फसल तैयार होने में कितना समय लगेगा। तूने जो फसल के लिए पैसा उधर लिया था ,बो कब तक लौटाएगा।
सुखिया- सरकार धान तो कट चुका है बस कल परसों में मंडी में बेच दु ,फिर आपके पैसे ब्याज समेत लौटा दूंगा।
सुखिया - अरी ओ रजनी ला मेरा कुर्ता ला टेम्पो आ गया है मैं धान मंडी में बेचकर आता हूं।
रजनी - अजी ये लो कुर्ता और धान बेचकर जो पैसे आएं उनसे महाजन के पैसे लौटा दो, अजी सुनते हो अगर पैसे बच जाएं तो मेरे लिए एक सस्ती सी साड़ी ले आना । कितने दिनों से ये फटी हुई साड़ी पहन रही हुं ।
सुखिया धान टेम्पो में भरकर ले जाता है और मंडी में पहुंच कर देखता है कि धान का भाव बहुत कम है।सुखिया दुःखी हो जाता है और सोचता है कि इतने पैसों से तो महाजन का कर्जा भी नहीं चुकेगा । मैं गेंहू की फसल कहां से बोऊंगा। सुखिया एक व्यापारी के पास जाता है और कहता है-
सुखिया - बाबू जी मेरा धान खरीद लो बहुत अच्छी किस्म का है ।
व्यापारी - अरे ये ज्यादा अच्छा नहीं है पर मैं तुम पर दया खाकर इसे पांच सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से खरीद सकता हूं।
सुखिया - बाबूजी इतने कम पैसों में तो फसल की लगान भी नहीं निकलेगी थोड़ा और कुछ भाव बढ़ा दीजिए।
व्यापारी - अरे नहीं ये बहुत ज्यादा है ,अगर तुम्हे देना है तो दो वरना यहां से ले जाओ। मैं नहीं खरीद पाऊंगा ।
सुखिया दुःखी हो जाता है और धान बेच देता है और कोई रास्ता भी तो नहीं है उसके पास ।
सुखिया - बाबूजी तीन क्विटंल धान है ,मेरे पैसे दे दीजिए। पंद्रह सौ रुपए बन गए है।
व्यापारी - लगता है तुम पहली बार मंडी में धान बेचने आए हो । पंद्रह सौ कैसे हो गए । अभी तो इसमें से भाड़ा कटेगा और मजदूरी क्या मैं अपने घर से दूंगा। अगर मैं पूरे पैसे किसानों को दूंगा तो मैं क्या यहां फालतू मैं बैठा हूं। मेरा भी तो कमीशन कटेगा और तुम्हे तत्काल पैसे चाहिए उसका भी कटेगा ।
सुखिया - अरे बाबू जी ऐसा मत कीजिए वरना मैं तो कहीं का नहीं रहूंगा।
व्यापारी - सभी रुपए लगाकर तीन सौ रुपए हुए और बारह सौ रुपए तुम्हारे होते है ।लेने हैं तो लो वरना दो सौ रुपए भाड़े के दो और धान यहां से ले जाओ मैं नहीं खरीद सकता ।
सुखिया - ठीक है बाबूजी लाओ बारह सौ रुपए ही दे दो । मैं धान वापस लौटा कर क्या करूंगा।
सुखिया बारह सौ रुपए लेकर दुःखी होकर मंडी से सीधे महाजन के घर जाता है और महाजन से कहता है कि" सरकार हिसाब कर लो तुम्हारे कितने रुपए हुए"
महाजन - हिसाब क्या सुखिया हजार रुपए तूने मुझसे लिए थे। इस हिसाब से चार सौ रुपए ब्याज के हो गए कुल चौदह सौ रुपए बन गए । मैं क्या तुझसे ज्यादा ले लूंगा। हिसाब तो राजा होता है सुखिया ।
सुखिया - सरकार मेरे पास तो सिर्फ बारह सौ रुपए है ये लीजिए। पर सुखिया दो सौ रुपए और चाहिए।
सुखिया - अभी नहीं है अगली फसल पर लौटा दूंगा और अगली फसल की बुआई के लिए भी कुछ पैसे दो सरकार मैं फसल बोऊंगा कैसे ।
महाजन सुखिया को फिर से हजार रुपए दे देता है । इस तरह सुखिया फिर से महाजन के ऋण जाल में फंस जाता है और दुःखी मन से घर की ओर चल देता है।
Written by
Mithun Anuragi