Kishor Kumar Bhardwaj 06 Mar 2025 कविताएँ अन्य 24164 0 Hindi :: हिंदी
हरियाली संग संवत्सर बिते फागुन मास संन्यास के पतझड़ के बाद जंगल दहक रहा जब खिले फूल पलाश के जब वन-उपवन सुखें हो जल की हो सबमे अमिट प्यास जब तप्त शिलायें हुई लाल धरती से निकलती हो आग ये कौन तपस्वी है वन में? केसरिया रंग प्रभात लिए केसरिया पुष्प शिखर पर उसके कर रहे प्रकृति का श्रृंगार प्रकृति के ये धर्म ध्वजा तपसी कोई ज्यो साधक हो इनकी छाया में बिछी हुई केसरिया पुष्पों की चादर हो गिरकर भी नहीं क्लेश कोई ये पुष्प बड़े ही त्यागी है प्रियतम से विच्छेदित है पर दर्शन के अभिलाषी है सम्बल से विच्छेद अधर से छूटे हुए बिलगाए से केसरिया वैराग्य का चोला लिए प्राण विमोह हो रूठे हुए तुम पतझड़ या बसंत से बेपरवाह मुस्करा कर मृत्यु को जीते हुए नहीं किसी से आस मन से हो तुम पुष्प पलाश के...