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माँ झूठ बोलती है, सुबह जल्दी उठाने सात बजे को आठ कहती नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है , मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़त� read more >>
एक बेरोजगार बेटे की माँ उसकी जेब रोज टटोलती थी बेटा चोरी से कभी कभी देख लेता और सोचता काश नौकरी मिल जाती माँ की पैसो की प्यास बुझा पता� read more >>
पिताजी दु:ख तो गाँव-मुहल्ले के भी हरते आए बाबूजी पर जिनगी की भट्ठी में ख़ुद जरते आए बाबूजी कुर्ता, धोती, गमछा, टोपी सब जुट पाना मुश्किल read more >>
आदमी की औकात... एक माचिस की तिल्ली, एक घी का लोटा, लकड़ियों के ढेर पे, कुछ घण्टे में राख..... बस इतनी-सी है, आदमी की औकात !!!! एक बूढ़ा बाप शा read more >>
सुबह जल्दी जगाने, सात बजे को आठ कहती है। नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है। मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है। छोटी छो� read more >>
दिल की बस्ती मे ले के आयें हैं, चाँद मुठ्ठी मे ले के आयें हैं, झूठ तुम को लगे तो तुम जानो, हम तो सच्ची मे ले के आयें हैं, कोई दुल्हन हो जैसे read more >>
❛वो औरत दौड़ कर रसोई तक, दूध बिखरने से पहले बचा लेती है। समेटने के कामयाब मामूली लम्हो में, बिखरे ख्वाबो का गम भुला देती है। वक़्त रहते read more >>
*सही सोच का नतीजा* कहा जाता है कि जितनी बडी सोच हमारी होगी उतना ही ज्ञान का विस्तार भी होगा। यानी हमारी सोचने समझने की शक्ति अन्य लोग � read more >>
जब सूरज निकलने से पहले चिड़ियों की चहचहाहट सुनाई देगी, माँ की आरती शुरू करते ही दूध वाले अंकल बेल बजाएंगे, अख़बार वाला आया की नहीं, और read more >>
पिता की भावनायें माँ को गले लगाते हो, कुछ पल मेरे भी पास रहो ! ’पापा याद बहुत आते हो’ कुछ ऐसा भी मुझे कहो ! मैनेँ भी मन मे जज़्बातोँ क� read more >>
मिल जाए वक़्त ज़रा सा अगर तो लौट आना कभी अपने घर तुम्हे याद कर अक्सर रोता है आँगन में खड़ा वो बूढ़ा शज़र — त्रिशिका श्रीवास्तव ‘ read more >>
दिन बदलते हैं ,साल‌ भी बदल जाते हैं, हर वक्त एक सा नहीं रहता, यहां लोग बदल जाते हैं, खुद के भरोसे ही नाव चलाना, यहां मांझी ही पलट जाते है� read more >>
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