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न जाने वो दिन कब आयेगा, जो जीवन का वसंत ऋतु कहलायेगा । न जाने वो दिन कब आयेगा, जब कुछ आधे अधुरे खवाब पुरे हो जायेंगे। न जाने वो दिन कब आये read more >>
लघुकथाः स्नेह-चिकित्सा एक झोपड़ी में एक बुड्ढा और एक बुढ़िया रहते थे। वे निःसंतान थे। कूली-मजूरी कर अपना जीवन-यापन कर रहे थे। मजदूरी अध� read more >>
नियति का न कोंई तोड़ ! नियति जब खोले पोल !! हवस की गठरी भर नहीं पाए ! कर्म की लेखी मिट नहीं पाए !! कर्म के जैसे बीज लगाए ! फूट के वो ही बाहर आए read more >>
//...कोरोना उपरांत...// बीत रहे अब , दुख और भय से , अवसाद भरे दिन, टूट रही है कड़ी , दूसरी लहर की...! धीरे-धीरे ही सही, फिर से रौनक लौट रही है मे� read more >>
जिंदगी के सपने को साकार करने के लिए हमने अपनी पूरी जिंदगी को दांव पर लगा दी ,ना जिंदगी के सपने पूरे हुए और ना ही कोई ख्वाहिश पूरी हुई ह� read more >>
अच्छे अच्छे को ख्वाब दिखा देती है , धन-दौलत भी क्या है | पता नही भगवान ने ऐसा क्या बनाया है , आज धन-दौलत की दुनिया है , अच्छे – अच्छे को चक� read more >>
आखिर कब तक ? गुलामी की जंजीरों में जकड़ी औरत आजादी का देखा न सपना उसके जुल्मों का खात्मा होगा आखिर कब तक ? जन्म लिया तो उसकी कर द read more >>
लफ्ज़ चुभते हैं,जुबान काटती है क्या कहें,किससे कहें,और क्यों कहें ये हुकूमत भी अमीरों के तलवे चाटती है जनजाति का एक तगमा देकर बड़ी चा� read more >>
अविश्वास ही अविश्वास हैं इस दोहरी समाज में इंसान ही इंसान को हर जगह गिरा रहा ग़ुम गई इन्सानियत इंसान के करतूत से संदेह में प्रारब्� read more >>
//...सुप्रभात...// _____ ____ ____ जीवन है एक वीणा सुख-दुख इसके तार...! इन दो पहलू के , भंवर जाल के बंधन में, उलझा है , सारा संसार...! इसलिए, अपनी और read more >>
स्वीकार कर लिया मैंने जिंदगी की कठिनाइयों को अपनी ख्वाहिशों को बताना छोड़ दिया जो मेरे अपने हैं बस वही मेरे अपने हैं अब मैं गैरों read more >>
एक छोटी सी गुड़िया थी मैं न जाने कब बड़ी हो गई हवा ऐसी चली है वक्त की कि आप की छांव से मैं दूर हो गई गुड़िया से खेलते खेलते न जाने कब म� read more >>
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