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Rupesh Singh Lostom
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Rupesh Singh Lostom
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, Uttar Pradesh
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बो हाथ बदला हैं
कौन कहता है की देश बदल रहा हैं मुझे तो लगता हैं समाज बिखर रहा हैं तलबार बही हैं बस धार कम हैं काटने वाला गर्दन भी बही मजबूर और मजलू�
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तू किताब होती तो
तू किताब होती तो पढ़ के जान लेता अक्षरों के लिखाबटों से पहचान लेता कोहचान से अंशार या अंशार से कोहचान बना लेता मैं लकीरें पढ़ पता न�
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न मैं रोता
न तू होती न मैं होता न कभी मिलते न मुलाकात होती न दिल मिलता न प्यार होता न इश्क में हम बेकार होते न मैं रोता न तू हस्ती न जख्म देती
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तू जो होती तो
तू जो होती तो क्या बात होती न रात न दिन बस साथ होती न बात होती न ही मुलाकात कुछ खास होती तू जो होती तो क्या बात होती दिल में प्यार �
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न जाने बो कैसे थे
न जाने बो कैसे थे किस मिटी से बने थे न टूटते थे डंडो से न हारते थे पंगो से चाहे बिरोधी अपना हो या कपटी अंग्रेज किसी से नहीं डरते थे न
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ऐ री सुन तो
तू मेरी हैं पर मेरी जैसी क्यों नहीं तुझे फ़िक्र भी हैं शायद फिर प्रीत क्यों नहीं तू मुझ में ही हैं ऐसा कहते है लोग मैं आज कल दीवाना �
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नारी
नारी हर रंग में रूप में धुप में छाब में जल में नीर में आग में अंगार में सुर में साज में राग में अनुराग में पात में उत्पात में प्रेम
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मैं और तू (देह )
मैं और तू (देह ) बैसे तो एक हैं पर हम दो हैं इक्क्षाये और समश्याए अलग हैं भिन हैं मैं और तू भी भिन हैं मैं तू नहीं तू मैं नहीं मैं तुझ �
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ऐसी फूलवाड़ी तू
हर रंग के फूल खिले ऐसी फूलवाड़ी तू मुझ में मेरे जीवन में जो उमंग भर देती ऐसी प्रीतम प्यारी तू जो मुझ पे इश्क के छाया बांके छाई ऐसी मद�
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युद्ध सा चल रहा
युद्ध सा चल रहा हैं मन में जैसे आश्मान बिखर रहा हैं आश्मान में टकराब है खुद से हौशलों से हालत से जैसे आदमी बदल रहा हैं आदमियत से जं�
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