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Rupesh Singh Lostom

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My Articles

जब तू उमड़ती हैं इश्क़ के ज्वार बनके ज़िस्म बरस पड़ता हैं ताजा फुहार बनके रोम रोम तरसता हैं तुझ में सराबोर होने को थोड़ा मुझे भी भिगो देती read more >>
मैं फूल हूँ काटों से लिपटा रहता हूँ कही भी कही भी हर मौसम में मिलता हूँ मैं कोमल हूँ और नाजुक भी मैं फूल हूँ मंदिर मस्जिद चर्च गुरुद read more >>
मैं फूल तू काटा फिर भी दोनों आधा आधा तू मुझ से दुखी दुखी फिर भी रक्षा करता हैं मैं कोमल नाजुक कली तू निठुर काटा फिर भी दोनों आधा आध read more >>
मन की चिंता तन की चोट कौन देखेगा किसे दिखाऊ जख्म देने बाला भी अपना अच्छा रह जाना है मौन बदन का भूख जिस्म की प्यास हृदये के पीड़ा समझ� read more >>
तू रुत होती धुप होती रंग थोड़ा रूप होती तू गुल होती गुलशन होती फूल और फूलबड़ी होती दो बून्द महक थोड़ा सा खुशबु होती तो कही गुलदान में ब read more >>
क्या खाख मजा हैं जीने में जब डर भरा हो सिने में डर को डरा कर देख देख क्या मजा हैं जीने में गहराई नापना हैं तो समंदर में उतर के देख सा� read more >>
जुल्म के आगोश थोड़ा थोड़ा आशमान पिघल रहा बूंद बूंद को तरस रही धरती सागर पर्वते निगल रहा प्रकृति तिल तिल मर रही नियति के गूंज से नियति � read more >>
मैं राख हूँ मैं राख हूँ खाख तो नहीं तुम मुझे राख कहते हो माथे पे लग जाऊ तो तिलक और शिव पे लागूं तो भस्म हूँ मैं राख हूँ खाख तो नहीं मे� read more >>
खामोस नजर से क्या कहु बिन बोले ही सब कुछ कहती हैं न राज छुपाती सिने में न रूप दिखती दर्पण में खामोस नजर से क्या कहु कहने को कई बात है read more >>
बो जो भी था बेड़ियों को तोड़ दो बो चार की चिंता छोड़ दो बक्त बेरह बन बैठा हैं मूड मूड के देखना छोड़ दे हार से तुम सिख लो समय को कोशना छोड़ द� read more >>
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