रुकी हुई सी ज़िन्दगी में अरमान बहुत है
बंजर हुई ज़मीन तो क्या, ऊपर आसमान बहुत है |
छु लूँ हर एक सितारे को, इसी कोशिश में हूँ
आजकल, चूका 4 � read more >>
यहां ज्यादा की जरूरत नहीं
थोड़े में गुजारा होता है।
जहां ज्यादा मिले
वहां सब बिखरा हुआ होता है।
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कौन बटोरेगा वो
बिखरा ह� read more >>
शीर्षक (रोटी)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
दर दर भटकता इन्सान है रोटी के लिये परेशान है।
कोई घी लगाकर खाता है ,
तो कोई सूखी ही चबाता है� read more >>
"कब तक सोएगा"
उठ जा अब तो
तू कब तक सोएगा
सुबह हो गई
सूरज खिड़की से
अंदर झांक रहा
लोग कितने आगे
निकल गए हैं
तू भी निकल पड़
वरना जी read more >>
"दर्द अपनों से"
सताए चाहे दुनिया जितनी
फिर भी हम हंस लेते हैं
आस्तीन में पलने वाले
सांप ही अक्सर डस लेते हैं ll
धन-संपत्ति सब कुछ � read more >>
जिन्दगी चलती है चलते रहो,
वक्त के साथ थोड़ा बदलते रहो ...
राह मुश्किल भी निकल जाएगी,
ठोकरें खा के भी थोड़ा संभलते रहो...
अंधेरा तो जुगनू स read more >>
शीर्षक (गर्मी का मौसम)
मेरे अल्फ़ाज़ (सचिन कुमार सोनकर)
उफ़ ये गर्मी हाय ये गर्मी।
उफ़ ये कैसी गर्मी है,
चारों तरफ ही आग है,
ये सब गर्मी का ही read more >>