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गुरुजनों की सीख
गुरुजन कहते थे मुझसे, पढ़ ले पढ़ ले कुछ बन जाएगा। में नादान था समझ ही न पाया, उनकी बातों में न जाने कितने अरमान थे। हंसता था मैं बातों प
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ज़ख्म खाके भी
जख्म ख़ाके भी जो मुस्कुराए वही इस दुनियां में हारकर भी जीत जाता है। धन्यवाद
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कुछ लोग ऐसे होते हैं
कुछ लोग ऐसे होते हैं यारो वादे करते हैं हजार पर, निभाते एक भी न मेरे यार। धन्यवाद
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रेत की तरह
रेत की तरह ए जिंदगी फिसलती जा रही है ओ वक़्त जो पीछे रह गया अब फिर से वही दर्द सहते जा रही हूं। धन्यवाद
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जिंदगी इतनी बेकार लगने लगी है
जिंदगी इतनी बेकार लगने लगी है अब दिल में कोई अरमान ही नहीं रही शेष अब कुछ न मेरे पास ऐसा जिससे करती फिरूं गुमानी इस जग से। धन्यवाद
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अजनबी।
एक अजनबी से हुईं मुलाकात शुरू में।........ जिस्मों को पीछे छोड़कर, उतरा है वो रूह में।
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विजय की चाह
भींच दूंगा मैं उसे जो द्वंद में शत्रु है l स्थिति भले हो मरण की , भले हो कटना खंड खंड भी l मरणासन्न में ही सही ll होगा विजय का जयघोष भी, भले �
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मिले न होते
खास हम मिले ही न होते तो ऐ दिल टूटने की आवाज भी न होती। धन्यवाद
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कभी - कभी
कभी - कभी हम जो कह देते हैं जरूरी नहीं है कि उस पे अड़े ही रहे कभी - कभी हलात और वक़्त के आगे झुकना ही पड़ता है। धन्यवाद
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कालबोध
◆◆◆【कविता】◆◆◆ "कालबोध" समय का चक्र,यूं चल रहा है अखंड अग्नि जल रहा है। मूड़ के देखा बचपन अपना जला भुना था कितना सपना, देख ज�
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एक ख्वाब
एक ख्वाब जो मैंने देखा था ओ पूरा होने से पहले ही टूट गया कितने अरमान जुड़े थें उस सपने से ओ अरमान चकनाचूर हो गया कितनी खुशियां जुड़ी थ�
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जिंदगी की उलझने..?
खोया बचपन वो अपना हमे याद है इन गली रास्तो कि हि तो बात है! कर लिये आज तक हमने जितने कर्म, फल के मिलने का हमको भी अहसास है की जिंदगी की व
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