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बेचैन दिल
बेचैन दिल ये मेरा जालिम, कुछ सुनने का अब नाम ना ले । बस दोष मढ़े सर औरो के, खुदपर कोई इल्ज़ाम ना ले।। चाहत तो थी की मैं बनु नेता, पर च�
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दावत
मैं दावत खाने बैठा था कौन अपना कौन पराया मैं खुद अंजान कौन बिन बुलाए मेहमान किन्तु प्रेम का संगत अनूठा था, देख देख कर एक दूसरे को पू�
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शायरी
शहर की आबोहवा में ,कुछ इस कदर परिवर्तन होने लगे हैं हुजूर ! खंडहर भी बयां करने लगे हैं, कि इमारत भी क्या शानदार थी।।
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ये महंगाई की कैसी मार
ये महंगाई की कैसी मार न ऊंचाई न आधार कब आलु प्याज सोने सम बन जाएं न जाने सोना कहां बिकवन आए हीरे का तो न कोई पार, ये महंगाई की कैसी मार �
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तू किताब होती तो
तू किताब होती तो पढ़ के जान लेता अक्षरों के लिखाबटों से पहचान लेता कोहचान से अंशार या अंशार से कोहचान बना लेता मैं लकीरें पढ़ पता न�
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ढोंग
ढोंग बड़े मुझ ढोंगी में, स्वयं कर मैं देवी पूजा । और विरोध उनका मैं करता, जो करते मूर्तिपूजा ।। कलश स्थापना मैं घर में करता, करता विध�
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भोपाल
मुझे याद है मुझे याद है वो भोपाल का जमाना किराए का घर लेना और किराया देर से देना बहाना तंगी का बताना और पैसे ट्रीट में उड़ाना रोज भेल क
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आधुनिक लड़की
मेरे लिए वो हीरे सी अनमोल होती है कंधे पर सर रखकर सारे राज खोल देती है कोशिशें जब भी मै प्यार-ए-इजहार की करता हूँ सारे ख्वाबों से जगाक�
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* दांत निपोरी *
* दांत निपोरी * बड़े प्यार से कर लो भैया थोड़ी सी तुम दांत निपोरी। पत्नी जब गुस्सा हो जाये बड़ी बड़ी आंखें दिखलाए । खाना पानी मिल न प�
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नर पर भारी नारी
*नर पर भारी नारी* अक्ल बाटने लगे विधाता, लंबी लगी कतारी। सभी आदमी खड़े हुए थे, कहीं नहीं थी नारी।। सभी नारियाँ कहाँ रह गई,
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संसद
संसद। अध्यापक ने कक्ष| में घुसते ही पूछा, डू यू नो व्हाट इज पार्लियामेंट। आज सुब
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अतीत के झरोखे से
अतीत के झरोखे से । (चतुर्थ भाग) । दीनू के स्कूल का पहला दिन, खाना खाते हुए श्रीमती जी बताया कि लॉक डाउन अभी और पंद्रह द
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