Santosh kumar koli ' अकेला' 21 May 2024 कविताएँ समाजिक युद्ध- हौआ 30468 0 Hindi :: हिंदी
वह मुझे, वह मुझे मारेगा, जगा मन-चोर। बम, बारूद, मिसाइल, तैनात चारों ओर। परमाणु भंडार होड़ में, बन रहे अहबाबख़ोर। अहम् के वहम में, सहम, ले रहा हिलोर। लड़े सैनिक, मरे सैनिक, जीते देश। मरे मां ममता, मरे मांग, जीते आवेश। रोए मानवता, हंसे गिद्ध, खगेश। मानव आगे हार गया, खुदा दरवेश। लापता, लावारिस, बारूद पर भविष्य। शहीद शव, बेवा के आंसू, हर देश के हिस्से। रोती सीमाएं, आंसुओं से सुलगता शस्य। मजबूर मानवता, अहंकार पाता लक्ष्य। खाली रसद भंडार, भरे गोला- बारूद। भुखमरी बारह माथा, हिर्सा हिर्सी , स्वाहा कुंड रहे कूद। शिक्षा, स्वास्थ्य, चिकित्सा का, घटता वजूद। रंतु पहुंचाती गंतव्य, मिसाइल मौत मंजिले मकसूद।