Santosh kumar koli ' अकेला' 28 Jun 2024 कविताएँ समाजिक विश्वास में घात 37545 0 Hindi :: हिंदी
एक बीज वपन से, पौधे उगते दो। कभी सामने वो, तो कभी सामने वो। पता नहीं कब, कौनसा, भाग जाए दे खो। यमली उपज से, मनुज बना, है सामने जो। विश्वास, अविश्वास, है नियत का घूर्णन। जो सामने, वही उड़ता, चमकता कण, उड़ता, चमकता, सामने वाले का देख गण। बनी नहीं दुनिया में, कोई वस्तु एक बरन। जहां विश्वास, वहीं होता विश्वासघात। जहां होती जीत, वहीं होती मात। जहां बादल, वहीं होती बरसात। अपना ही देता धोखा, है सनातन बात।