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सुधराई- सफ़र

Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक सुधराई- सफ़र(सुधरना- सुधारना) 58558 0 Hindi :: हिंदी

न ज़रूरत न हसरत, दूसरों को बदलने की।
ज़रूरत व हसरत है, खुद के सुधरने की।
वे तो न सुधर सके, उनका कोई ख़ता नहीं।
सुधारने के फेर में, खुद कितना बिगड़ जाए पता नहीं।
इस ठेके से, जा मुकर।
मत जा उधर, खुद ही सुधर।
चमड़ा न बिछा राहों में, खुद ही जूते पहन लो।
धरती को न ढक, छाता खुद ही तान लो।
दुनिया को सुधार लो, चाहे कुत्ते की सीधी कर लो पूंछ।
दुनिया को सुधार लो, चाहे जीवित शेर की उखाड़ लो मूंछ।
अपने पंख, मत कुतर।
मत जा उधर, खुद ही सुधर।
सुधारने वाले खुद ही, बिगड़कर चले गए।
दुनियावाले अपनी बुराई, उनके रगड़कर चले गए।
ज्ञान बांटना बंद कर, खुद पर कर उपकार।
सुधारने से नहीं, सुधरेंगे जब पड़ेगी समय की मार।
सीख, मुखर हुनर।
मत जा उधर, खुद ही सुधर।

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