Santosh kumar koli ' अकेला' 15 Jul 2024 कविताएँ समाजिक स्पंदित मन 29276 0 Hindi :: हिंदी
मन ताल जल को, स्थिर करो। चंचल इंद्रियों के तर्ष को, बधिर करो। कंकड़ अकड़ हाज़िरी की, खातिर करो। पानी, पानीय है, मत रुधिर करो। प्रक्षेपित कंकड़, तल में जमा करो। प्रक्षेपक को मन से, क्षमा करो। जल की कल में, मन से रमा करो। सूखी नदी से, मत उपमा करो। मन को विचलित करता, हल्का हवा का झोका। हवा का काम हवा करती, नौका का काम नौका। खुद का खुद पर वश नहीं, हवा को किसने रोका? मनकना, स्पंदन क्रंदन होगा, जीवन का झरोखा।