Santosh kumar koli ' अकेला' 23 Aug 2024 कविताएँ अन्य प्रेमी की अभिलाषा 23917 0 Hindi :: हिंदी
उसके जूड़े का बनूं, यदि मैं बन फूल सकूं। रेशमी जुल्फ़ों की महक से, अपनी महक भूल सकूं। आंसू बनूं उसकी आंखों का, नीली आंखों में घर कर सकूं। यदि बहना भी पड़े, तड़पकर उसके गालों पर मर सकूं। हार बनाओ, तो उसके गले का, साथ में देना दो कर। ताकि वक्षःस्थल पर कल्लोल का, आनंद ले सकूं जी भर। मोती बनाओ, तो उसकी नथनी का, साथ में देना रदन। ताकि गूलर, गोल कपोलों का, कर सकूं रसास्वादन। अधररज बनूँ, तो उसके लबों की, उसके होंठों में जम सकूं। ज्यूं अलि कली से लिपटे, उस रमक में रम सकूं। अंजन बनूं उसकी आंखों का, शोभा बनूँ उस कोर की। नज़र चुराने का नज़ारा, देख सकूं चित्त चोर की। बनूँ मेखला उस कटि की, मदमस्त कमर पर झूम सकूं। कर अभिलंघन, प्रेमालिंगन, लंपट नितंब चूम सकूं। पायल बनूँ उसके पैर की, साथ दो देना नैन। मन में लड्डू रहें फुटते, निर्निमेष देखूं दिन रैन। हर जन्म में हो मिलन, चाहे जन्म लेऊं सौ बार। उस रमणी के हर अंग पर, सौ- सौ अप्सरा दूं वार।