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निराशा क्यों?

Santosh kumar koli ' अकेला' 24 Jul 2024 कविताएँ समाजिक निराशा क्यों? 29725 0 Hindi :: हिंदी

दुनिया बेईमानी का खाती है, 
पर ईमानदारी पूजने वाले भी तो हैं। 
लोग झूठ के घाट पर नहाते हैं, 
पर सत्य दरिया में उतरने वाले भी तो हैं। 
लोग जलन जहाज में बैठे हैं, 
पर प्रेम तरणी में तैरने वाले भी तो हैं। 
लोग कामचोरी की बीन बजाते हैं, 
पर कर्मण्यता ढोल पीटने वाले भी तो हैं। 
लोग दुख में मुख मोड़ते हैं, 
पर दर्द पर मलहम मलने वाले भी तो हैं। 
दुनिया में भुखमरी जिन जिंदा है, 
पर दानवीर कर्ण बनने वाले भी तो हैं। 
लोगों की नफ़रती फ़ितरत है, 
पर ईद, दीवाली पर मिलने वाले भी तो हैं। 
दुनिया में पाप की छाया है, 
पर पार्थ सारथी बनने वाले भी तो हैं। 
एक बात नहीं सब पर लागू, 
देख लो आजू-बाजू। 
तोल नहीं सकते सबको, 
एक बाट एक तराजू। 
एक डंडे से नहीं चलाते, 
मंगल, दंगल, छाजू, राजू। 
अच्छा देखो, सुनो, बनो, 
ज़िंदगी है ईश ब्याजू।

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