Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक नारी शक्ति 50353 1 5 Hindi :: हिंदी
नारी, अब तेरी बारी। मन उमंग में, हक़ीक़त के रंग भरो। निगृहीत भाव, संतप्त मन, तारों को झंकृत करो। लोहे, चांदी व सोने की, सलाख़ें टटोलो। सदियों से जकड़े परों को, अब तो खोलो छोड़ो, लज्जा की लाचारी। नारी, अब तेरी बारी। सादगी सज्जनता भभूत, शीलता लिबास। देवी बना शोषण किया, काट दो स्वांगी पाश। पुरुष-शक्ति का जहां, हो जाता है निपात। होती है वहां से, नारी शक्ति की शुरूआत। तुझे, भजे त्रिपुरारी। नारी, अब तेरी बारी। कामिनी नहीं, दामिनी बनो, बेल नहीं, नकेल बनो। भोग्य नहीं, योग्य बनो, अच्छी नहीं, सच्ची बनो। ख़्वाब नहीं, जवाब बनो, बेसहारा नहीं, सहारा बनो। सहना नहीं, कहना बनो, तमाशा नहीं, तमाचा बनो। श्रृंगारी नहीं, बनो अंगारी। नारी, अब तेरी बारी। जो है, वही बनी रह, मत बन बनी बनाई। तभी पटेगी सदियों की, नर-नारी की खाई। मिटा दो संसारी, छल-छाया की छाप सलाखें बनाने वाले, मर जाएंगे अपने-आप। गूंजे, अंबर में किलकारी। नारी, अब तेरी बारी। नारी, अब तेरी बारी।
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