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मति -भ्रम एक विषधर बीच डगर

Santosh kumar koli ' अकेला' 02 Dec 2023 कविताएँ समाजिक मति -भ्रम 24476 0 Hindi :: हिंदी

एक विषधर,
बीच डगर।
पड़ा,
मेरे सफ़र।
मैं ठिठका, अटका,
देख चट-पट चक्कर।
काला- काला,
स्फीत स्फोटा।
बीच रास्ते,
लोटा -पोटा।
कभी हिले, कभी डुले,
कभी शांत।
हुआ कलेजे पानी,
बोले दांत।
काल ठेठ,
पूंछ लपेट।
है नाग,
या करैत।
मैं संभला,
भजा पति कमला।
धीरे-धीरे,
आगे बढ़ा।
वह अड़ा, अड़ा,
अड़ता रहा।
वह पड़ा- पड़ा,
भ्रम संजनित पड़ा।
नज़दीक से,
जब डाली दृष्टि।
वह थी एक रस्सी,
भ्रम सृष्टि।
सांच कम,
है झूठ प्रक्रम।
हर मनुज,
जीता मति भ्रम।

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