Santosh kumar koli ' अकेला' 03 Jun 2024 कविताएँ समाजिक ईरण ईमानदारी 29350 0 Hindi :: हिंदी
जब तक मौक़ा नहीं मिले, पहनें ईमानदारी का चोला। मौक़ा मिलते ही झोले से, निकले बम का गोला। काम सरे तो खूंटी टांग दें, ईमानदारी का झोला। कांटे, बाट की हो जांच, जिसने खुद को ईमानदारी से तोला। भेड़ पर ऊन, थैली में चून, कोई न छोड़े चुटकी पाव। बस, मिल जाए दाव। बस, मिल जाए दाव। सब लगाते, मोके पर झोके। मन म़ाफ़िक मोके से मुंदते, ईमानदारी के गोखे। बेईमानों के झुकते हैं, कलयुग में झरोखे। ईमानदार तो चोखे हैं, बस बेचारे चोखे। मौका़ मिलने तक ही है, ईमानदारी का चाव। बस, मिल जाए दाव। बस, मिल जाए दाव। मैं ईमानदार, मैं ईमानदार, मौका़ पड़े ही जान। मौके पर चौका जमकर मारता, हर इंसान। मौका़ दो, फिर देखो असल ईमान। गली थूनियों पर टिकी है, ईमानदारी की छान। मल्लाह ही डुबा दे, मझधार में नाव। बस, मिल जाए दाव। बस, मिल जाए दाव।