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डोर की व्यथा

Santosh kumar koli ' अकेला' 30 Mar 2023 कविताएँ समाजिक डोर की व्यथा (डोर का दर्द) 46606 0 Hindi :: हिंदी

कोई नहीं सुनता, दुनिया में व्यथा डोर की।
सब अपनी- अपनी बेचते, कौन बेचता कमज़ोर की।
पतंग परवान चढ़, मेरे बल नाचती।
मेरे छोर से और बनती, दुनिया किसका लिखा बाचती।
कटती है डोर, लोग कहते कट गई पतंग।
कोई होता है शहीद, कोई जीतता है जंग।
महीन डोर चाहे हो ठर्रा, देखो सिलाई मशीन की ये दुनिया का ढर्रा।
टूटा धागा बिखर गए फूल, देखो माला टूट गई धागे को गए सब भूल।
कठपुतली के जीवन को, डोर थामती।
लोग कहते देखो, कठपुतली कैसे नाचती।
सुन डोर, समुद्र दिखता, नहीं दिखती पहली बूंद।
क़ामयाबी देखती दुनिया, मेहनत से ले आंखें मूंद।
जलता है तेल, पर दीपक नाम पा रहा।
बजता है ढोल, और चाम चोट खा रहा।
दिखता है बीज कहां, दिखते फूल, फल सलोने।
आंसू पोंछ ले  हे डोर, सबके अपने- अपने रोने।

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