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बदलाव

Santosh kumar koli ' अकेला' 17 Jul 2024 कविताएँ समाजिक बदलाव 30249 0 Hindi :: हिंदी

अच्छे-अच्छे वक्ताओं की, 
हुई बोलती बंद। 
बजरबट्टू हो रहे, 
समझते थे अक्लमंद। 
नज़रों से नज़र चुराकर, 
हो गए नज़रबंद। 
तर्क का निकालते अर्क, 
भक्त बन गए अंध। 
निष्क्रिय, निठल्ले, 
हुए स्वचालित मशीन। 
गुम हुई लफ़्ज़ की नब्ज, 
हुए तमाशबीन। 
हे की हुंकार वाला, 
बजाता हें हें की बीन। 
राशन,वसन,सदन, 
चीज़ याद रह गई तीन। 
पाषाण हृदय, 
हुआ पानी -पानी। 
स्व विस्मृत, 
याद करे दादी- नानी। 
हेकड़ी मूंछ, 
भाग -भाग भरती पानी। 
कह 'अकेला' सारा खेला, 
ज़िम्मेदारी की कहानी।

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