Santosh kumar koli ' अकेला' 17 May 2024 कविताएँ समाजिक बात की बात 38597 0 Hindi :: हिंदी
मन ज़मीं में, पवित्र विचारों के बीज बोएं। भूत को भूत बना, भविष्य के सपने संजोएं। काफी़ के फेर में, बा़की क्यों खोएं? फटे दूध माखन नहीं, क्यों बारंबार बिलोएं? खुद की करनी, खुद की भरनी, क्यों आंखें भिगोएं? सूर्य के चक्कर में, सितारे क्यों खोएं? खुद की कालिख, क्यों, पर आंसुओं से धोएं? मोती से मोती फोड़कर, क्यों जीवन मोती खोएं? सत्कर्म मणियों से, जीवन माला पिरोएं। इहलोक चक्कर में, क्यों परलोक डुबोएं? यह दुनिया ऐसे ही चलेगी, हम होएं या ना होएं। रब लीला रब ही जानें, आओ रब झोली में सोएं।