Santosh kumar koli ' अकेला' 06 Aug 2024 कविताएँ समाजिक अछूत बस्ती 27264 0 Hindi :: हिंदी
दूसरे ग्रह पर आ गए, लगता घुसते ही मोहल्ला। सिंह, शर्मा नहीं, ये हैं नाथ्या, पांच्या, कल्ला। हर रोज़ गाली- गलौज, बरतन फेंकने का हल्ला। अफ़सर, नेता ये जाने नहीं। हलाल करते हैं उपल्ला। उपल्ला मल्लाह के सहारे, इनके वोटों की कश्ती है। ये अछूतों की बस्ती है। गंदे पानी में छप- छप, बदबू से होता स्वागत। टिन, तिरपाल, छप्पर के घर, पितृ पुजते वंशागत। ज़मीं, जायदाद की नहीं लड़ाई, पर ऐंठ, ऐंड पर रहते डट। बाहर भीगी बिल्ली, अपनों पर दिखाते ताक़त। इनकी फूट की लूट, सस्ती से भी सस्ती है। ये अछूतों की बस्ती है। सड़क बनाई, गटर खुदाई, साफ़ सफा़ई इनका काम। इनकी ग़रीबी के आगे, होती ग़रीबी बदनाम। रोम -रोम में दारू देवी, ठेका पूजते सुबह- शाम। पेट से परे सोच नहीं सकते, जीते मरते हैं गुमनाम। देवताओं को रखते ताक़, बस, भैरव भोमिया की हस्ती है। ये अछूतों की बस्ती है। भूमि टुकड़ा बिके नहीं, तब तक पेट में रहती टांस। अंधविश्वास की खुद परिभाषा, डोरा, ताबीज़ गल की फांस। मुर्गा- मुर्गी, बतख़, बढ़ेल, सूअर, मक्खी उड़ते डांस। घर में बच्चे फ़ांक़ा रहते, चाहिए मद -मांस। विलायती महंगी सही, अपनी थैली तो सस्ती है। ये अछूतों की बस्ती है। ये अछूतों की बस्ती है।