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आत्महत्या और आखरी सीढी से पहले

Danendra 03 Jul 2025 कहानियाँ समाजिक 23552 0 Hindi :: हिंदी

रात के साढ़े ग्यारह बजे थे। शहर की सड़कें खाली था और दिलों की भीड़ सबसे ज़्यादा था। उसी वीराने में एक सन्नाटा धीरे-धीरे एक पुल की तरफ़ खिंचता चला गया — हाथ में एक पुराना बटुआ लिए, आँखों में थका हुआ उम्मीदें लिए, विकास।

विकास ने पढ़ाई पूरी किया था , लेकिन नौकरी की तलाश में हर दरवाज़ा बंद लगता। घर की हालत भी कुछ बेहतर नहीं थी। पिता बीमार थे, मां चिंता में घुली जाती थी। कई कोशिशों, असफल इंटरव्यूज़ और ठुकराए गए सपनों के बाद विकास का भरोसा जैसे चुपचाप दम तोड़ने लगा।

वो सोच चुका था — “अब बस, और नहीं।” उसी सोच ने उसे उस पुल तक पहुँचा दिया।

लेकिन जैसे ही वो रेलिंग के पास पहुँचा, किसी ने पीछे से आवाज़ दी,
“भैया, गिरोगे तो मोबाइल तो दे दो, मुझे ज़रा गेम खेलना है।”

एक 12-13 साल का लड़का था, जो वहीं पास के फुटपाथ पर रहता था। नाम था सोनू।

विकास एक पल को चौंका। फिर थोड़ी हँसी के साथ बोला, “तू यहाँ क्या कर रहा है इतनी रात को?”

सोनू मुस्कुराया, “मैं रोज़ यही सोचने आता हूं कि एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा। बस सपने देखने की आदत नहीं गई।”

विकास ने हैरानी से पूछा, “तू सड़क पर रहता है, ठीक से खाना नहीं मिलता, फिर भी सपने देखता है?”

सोनू बोला, “क्यों नहीं? जो दिन बीत गए, वो तो गए। लेकिन जो आने वाला है, वो मेरा है। भैया, अगर आप जैसे लोग हार मान जाओगे, तो हम जैसों को कौन रास्ता दिखाएगा?”
विकास चुप हो गया। कुछ पल बाद उसने रेलिंग से हाथ हटा लिया और ज़मीन पर बैठ गया।

“सोनू , चल एक काम करते हैं… कल से तू मुझे सपने देखना सिखाएगा, और मैं तुझे पढ़ाना शुरू करूंगा। सौदा मंज़ूर है?”

विकास ने ताली बजाई, “डन!”

उस दिन विकास ने जाना कि जिंदगी की सबसे काली रात के बाद भी एक सुबह आती है। बस आख़िरी सीढ़ी से पहले रुक कर देखना होता है — कहीं कोई छोटा सा सपना इंतज़ार कर रहा होता है, जो जीने की वजह बन जाए।

सीख:
जब अंधेरा गहरा हो जाए, तब समझो कि सुबह बहुत क़रीब है। हार मानने से पहले एक बार खुद से सवाल पूछो — "क्या यही अंत है, या एक नया मोड़?"

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