Anilkumar Rathwa (Sameer) 04 Jan 2026 ग़ज़ल समाजिक “अद्वितीय” 11111 2 5 Hindi :: हिंदी
ज़िंदगी कुछ भी दोहराएगी नहीं, जो हाथ से फिसल गया, वो आएगा नहीं। जो आज थक कर बैठ गए राह में, कल मंज़िल भी उनका इंतज़ार करेगी नहीं। हर दिन इम्तिहान है, हर रात सवाल, यहाँ बहाने लिखने से तक़दीर बदलेगी नहीं। जो यादें आज सहेज लोगे सीने में, वक़्त की आँधी उन्हें छीन पाएगी नहीं। हौसलों को आदत डालो जलने की, बुझी हुई आग से रोशनी आएगी नहीं। युवाओं! ये उम्र समझौतों के लिए नहीं, क्योंकि कायरों के नाम इतिहास में लिखे जाएँगे नहीं। जो आज टूट कर भी खड़ा हो गया, उसे हराने की साज़िश भी काम आएगी नहीं। याद रखो— ज़िंदगी एक ही बार मिलती है दोस्त, यह रिहर्सल नहीं है, जो फिर से निभाई जाएगी नहीं।
4 months ago
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