Anilkumar Rathwa (Sameer) 30 Jan 2026 ग़ज़ल समाजिक "रूह की अदालत" 6326 0 Hindi :: हिंदी
मतला: वक़्त के आईने में मेरा सच नज़र आता है, जो मैं बनकर चलता हूँ, वही रूप बन जाता है। हर लम्हा सवाल बनकर रूह से टकराता है, मेरी खामोशी का साया मुझको कुछ बताता है। घड़ी की सुइयों से मंज़िल का पता नहीं मिलता, मेरे इरादों की आग से रास्ता बन जाता है। जो गिरकर भी मिट्टी में आसमान खोज ले, वो धूल नहीं, अपने नाम की पहचान बन जाता है। तक़दीर मेरे हाथों की लकीरों में कैद नहीं, मेरे पसीने की बूंदों से हर ख्वाब बन जाता है। मक़्ता: “अनिल” ठहरना भी यहाँ एक हार बन जाता है, चलते रहने से ही मेरा नाम बन जाता है।