Anilkumar Rathwa (Sameer) 20 Feb 2026 ग़ज़ल समाजिक #Google#motivational#poetry# 8011 0 Hindi :: हिंदी
मुसाफिर को नई राहों का मंज़र मिल गया है, मेहनत का उसे आज समंदर मिल गया है। कल तक जो था खुद इक अदना सा तालिब-ए-इल्म, आज उसे उस्तादों का वो दफ़्तर मिल गया है। हुनर की शमा अब वो हर एक दिल में जलाएगा, सिखाने का जिसे खुद ही मुकद्दर मिल गया है। प्रिंसिपल की कुर्सी तो बस इक शुरुआत है दोस्त, परवाज़ भरने को इसे अब खुला अंबर मिल गया है। सजेगी महफ़िलें अब उसकी कामयाबी की हर तरफ, मशक्कत का उसे ये कीमती ज़ेवर मिल गया है।