Anilkumar Rathwa (Sameer) 14 Aug 2025 ग़ज़ल अन्य "अनकही ज़ुबान" 14995 0 Hindi :: हिंदी
मतला: कभी-कभी ख़ामोशी भी बयान बन जाती है, हर अनकही सी बात पहचान बन जाती है। लबों पे जो न आए, वो नज़र कह जाती है, चुप्पी भी दर्द की ज़ुबान बन जाती है। भीड़ में हर कोई आवाज़ उठाता फिरता है, जो चुप रह जाए, वही शान बन जाती है। शोर में खो जाते हैं सच के कई निशान, ख़ामोशी ही अक्सर गवाह बन जाती है। वक़्त सिखा देता है मौन की ताक़त हमें, हर हार एक दिन इम्तिहान बन जाती है। मक़ता: “अनिल” जो खामोशी को भी पढ़ ले दिल से, उसके हर सन्नाटे में एक पहचान बन जाती है।