प्रवीण कुमार 11 Oct 2025 कविताएँ समाजिक 7304 0 Hindi :: हिंदी
एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच। अकेला भी अपना है, अकेले में भी अपना है। सच निर्दयी भी है। पर इन्सान की नियत का वजूद भी। एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच। सच है जिसे हम मानते नहीं। नियत है जिसे हम जानते नहीं। इनके रिश्ते से जो दूर हो, महज़ एक इन्सान। सच में,हम उसे जानते नहीं। एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच। आज अकेला तो है। किसी बहन -भाई से। कोई दोस्त के रिश्ते से दूर है। लेकिन हां। नियत और सच से बना इन्सान है। भले ही जिंदगी मेहमान है। मौत; कुदरत बनाने वाले का पैग़ाम (बुलावा) है। एक रिश्ता ही है। इन्सान की नियत और सच में। अकेला भी अपना है, अकेले में भी अपना है।